रायपुर .छत्तीसगढ़ के बस्तर में यहां के आदिवासियों के जीवन में प्रकृति का सबसे ज्यादा योगदान रहता है। जहां  हम प्लास्टिक, स्टील एवं अन्य धातुओं से बने रोजमर्रा की वस्तुओं का उपयोग करते है वहीं बस्तर में आज भी आदिवासी प्राकृतिक फलों , पत्तियों एवं मिटटी से बने बर्तनों का ही उपयोग करते है।ऐसा ही प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं में नाम आता है तुम्बा का, जो हर आदिवासी के पास दिखाई पड़ता है। तुम्बे का प्रयोग पेय पदार्थ रखने के लिए ही किया जाता है। इसमेंं रखा हुआ पानी या अन्य कोई पेय पदार्थ सल्फी , छिन्दरस , पेज आदि में वातावरण का प्रभाव नहीं पड़ता है।  इसे देशी थर्मस,बस्तरिया थर्मस एवं बोरका के नाम से भी जाना जाता है यदि उसमे सुबह ठंडा पानी डाला है तो वह पानी शाम तक वैसे ही ठंडा रहता है। अब यह लुप्त होने के कगार पर है तथा आधुनिक मिनरल बोतलो ने तुम्बा का स्थान ले लिया है ज़िससे अब तुम्बा कम देखने को मिलता है। वह दिन अब दुर नहीं जब हमें तुंबा संग्रहालयों में सजावट की वस्तु के रूप में दिखाई देगा। वर्तमान में तुम्बा के संरक्षण आवश्यकता है ,भावी की पीढ़ी को भी तुंबा बनाने एवं इसके उपयोगीता एवं महत्व की जानकारी होनी चाहिएlतुंबा में अधिकांशत सल्फी, छिंदरस, ताड़ी जैसे नशीले पेय पदार्थ रखे जाते है।  तुम्बा लौकी से बनता है। इसको बनाने के लिये सबसे गोल मटोल लौकी को चुना जाता है ज़िसका आकार लगभग सुराही की तरह हो। ज़िसमे पेट गोल एवं बडा और मुंह वाला हिस्सा लम्बा पतला गर्दन युक्त हो।  उस लौकी में एक छोटा सा छिद्र किया जाता है फिर उसको आग में गर्म कर उसके अन्दर का सारा गुदा छिद्र से बाहर निकाल लिया जाता है।

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