रायपुर । अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ. दिनेश मिश्र ने एक महत्वपूर्ण पहल की जानकारी दी है, जिसमें उन्होंने बकरीद (ईदुज्जुहा) पर पारंपरिक रूप से जीवित प्राणी की कुर्बानी देने के बजाय केक काटने का सुझाव दिया है। तेलंगाना सरकार ने एक आदेश जारी किया है, जिसमें बकरीद के दौरान ऊंटों को काटने सहित किसी भी मकसद से लाना गैरकानूनी करार दिया गया है। कानून तोड़ने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

डॉ. दिनेश मिश्र ने बताया कि तेलंगाना हाई कोर्ट में बकरीद के दौरान ऊंटों की कुर्बानी पर रोक लगाने की मांग वाली एक जनहित याचिका दायर की गई थी। कोर्ट ने आदेश जारी करते हुए कहा कि परंपरा के नाम पर ऊंट को नहीं मारा जाना चाहिए। इससे पहले भी महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तराखंड, और उत्तरप्रदेश में धार्मिक अवसरों पर विभिन्न पशुओं की कुर्बानी पर रोक के आदेश जारी किए जा चुके हैं। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 2018 में बकरीद सहित सभी धार्मिक आयोजनों में होने वाली कुर्बानी पर सार्वजनिक स्थानों में रोक लगा दी थी। उत्तरप्रदेश में 2017 में गाय, बैल, भैंस, ऊंट आदि जानवरों की कुर्बानी पर निषेध जारी किया गया था।

डॉ. मिश्र ने बताया कि पिछले वर्ष देश के कुछ स्थानों पर ईको-फ्रेंडली ईद मनाने के उदाहरण सामने आए हैं। लोगों ने जीवित प्राणी की कुर्बानी देने के बजाय केक काटकर धार्मिक रस्म अदा की। कुछ स्थानों पर तो लोगों ने केक पर ही बकरे का चित्र लगाकर बकरा केक काटा और सांकेतिक रूप से धार्मिक रस्म पूरी की। इस पहल से निर्दोष प्राणियों की रक्षा भी की गई।

डॉ. मिश्र ने कहा कि देश के कई राज्यों में पशुबलि के निषेध के सम्बंध में कानून बने हुए हैं, परंतु उनका पालन न होने से लाखों मासूम पशुओं की कुर्बानी दी जाती है। उन्होंने कहा कि सभी धर्म प्रेम और अहिंसा की शिक्षा देते हैं। किसी की मनोकामना पूरी करने के लिए किसी प्राणी की जान लेना ठीक नहीं है। पिछले वर्ष महाराष्ट्र के कोराडी मंदिर और अन्य स्थानों पर बलि प्रथा बंद कर दी गई थी। बकरीद में भी कई स्थानों पर मुस्लिम धर्मावलंबियों ने कुर्बानी की प्रथा का परित्याग किया और केक काटकर धार्मिक रस्म अदा की।

डॉ. मिश्र ने जोर देते हुए कहा कि कुर्बानी का अर्थ त्याग करना होता है। जरूरतमंदों को नगद राशि, दवा, कपड़े, किताबें, और स्कूल फीस दान कर आत्मसंतुष्टि पाई जा सकती है। देश के अन्य प्रदेशों की तरह तेलंगाना में भी किसी जिंदा प्राणी की कुर्बानी देने के स्थान पर केक काटकर धार्मिक रस्म अदा की जा सकती है। इस पहल से निर्दोष प्राणियों की जान भी बचाई जा सकती है।

डॉ. दिनेश मिश्र ने इस बात पर भी जोर दिया कि महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी ने अहिंसा के सिद्धांत को प्रचारित किया है। महावीर स्वामी ने ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत को प्रमुखता दी है। महात्मा बुद्ध ने कहा है कि “मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है”। अगर हम किसी को जीवन नहीं दे सकते, तो हमें किसी का जीवन लेने का अधिकार भी नहीं है।

इस पहल का उद्देश्य है कि धार्मिक रस्में अहिंसा और करुणा के साथ निभाई जाएं, जिससे समाज में प्रेम और सद्भावना का संदेश फैल सके।

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