भारत में इस साल अवैध शिकार, क्षेत्रीय विवाद, मानव-वन्यजीव संघर्ष, ट्रेन दुर्घटनाओं और प्राकृतिक कारणों से अब तक 91 शाही बाघों की मौत हो चुकी है। यह एक खतरनाक आंकड़ा है जिसके मुताबिक देश में हर महीने औसतन लगभग 17 बाघों की मौत हो रही है।

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के आंकड़ों के अनुसार पिछले साढ़े पांच महीनों में देश ने अवैध शिकार, क्षेत्रीय विवाद, मानव-वन्यजीव संघर्ष, ट्रेन दुर्घटनाओं और प्राकृतिक कारणों से 91 शाही बाघों को खो दिया है । यह खतरनाक आंकड़ा बताता है कि हर महीने देश में औसतन 17 बाघ मौत के मुंह में समा रहे हैं।

अगर यही सिलसिला जारी रहता है तो इस साल बाघों की मौत के कुल मामलों की संख्या पिछले साल के 126 के आंकड़े को पार कर सकती है। गौरतलब है कि 2019 से 2023 तक की पांच साल की अवधि में समूचे भारत में कुल 628 ‘धारीदार वन्य शिकारी’ मारे गए हैं।

भारत में प्रोजेक्ट टाइगर की देखरेख करने वाले एनटीसीए के आंकड़ों के अनुसार देश में 2019 में 96, 2020 में 106, 2021 में 127, 2022 में 121 और 2023 में 178 बाघों की मौत हुई थी।

इस बीच 2025 के पहले पांच महीनों में बाघो की मौत से जुड़े आंकड़े हर राज्य में असमान ही है जिसमें आधे से अधिक यानी 49 मौतें मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में हुई हैं जहाँ ट्रेन दुर्घटनाएँ और संक्रामक रोग भी इनकी मौत के जिम्मेदार पाये गये हैं1

अकेले महाराष्ट्र में ही 26 बाघों की मौत की सूचना है। उसके बाद मध्य प्रदेश में 24 बाघों की मौत हुई। अन्य प्रभावित राज्यों में केरल (नौ), असम (आठ), उत्तराखंड (सात), कर्नाटक और उत्तर प्रदेश (चार-चार) और तेलंगाना (एक) शामिल हैं।

आंकड़ाे से जानकारी मिली है कि 42 बाघ अपने अपने संरक्षित स्थानों के अंदर ही मृत पाए गए जो प्राकृतिक कारणों या क्षेत्रीय लड़ाई के कारण हो सकते हैं। वहीं 35 बाघ इन संरक्षित क्षेत्रों के बाहर मरे पाए गए।

अधिकारियों ने इसका कारण मानव-पशु संघर्ष और बिजली के झटके के अलावा अन्य कारणों को बताया। इनमें एक महत्वपूर्ण आंकड़ा बाघो के 14 शावकों का है। उसके बाद 26 मादा और 20 नर बाघो का आंकड़ा आता है।

इस क्षेत्र में काम कर रहे एक गैर सरकारी संगठन ‘भारतीय वन्यजीव संरक्षण सोसायटी’ (डब्ल्यूपीएसआई) से उपलब्ध डेटा अधिक चिंताजनक है। यह दर्शाता है कि 2025 में बाघों की मौतों में वृद्धि हुई है जिसमें अब तक 120 मौतें दर्ज की गई हैं । इनमें 96 प्राकृतिक या मानव-प्रेरित कारणों से और 24 अवैध शिकार और वन्यजीव तस्करी से जुड़ी हैं।

इस बीच एनटीसीए के आंकड़ों के अनुसार पिछले 12 वर्षों में समूचे भारत में 1,386 बाघों की मौत हुई जिनमें से लगभग पचार प्रतिशम मौतें नामित बाघ अभयारण्यों में हुई हैं।

उधर संरक्षणवादियों ने आशा दिलाते हुए कहा है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और मानव आबादी के बावजूद दुनिया के लगभग तीन-चौथाई बाघ अब भी भारत में हैं।

भारतीय वन्यजीव संस्थान के संरक्षणवादी वाईवी झाला ने ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित अपने हालिया अध्ययन में कहा कि ‘2010 से 2022 तक भारत में बाघों की संख्या अनुमानित 1,706 से दोगुनी होकर लगभग 3,700 हो गई है’।

हालांकि अध्ययन में यह भी चेतावनी दी गई है कि इससे ‘आत्मसंतुष्ट’ होने की आवश्यकता नहीं है। अध्ययन के मुताबिक ‘भारत में बाघों की संख्या में वृद्धि एक असाधारण उपलब्धि है लेकिन चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। सामाजिक-राजनीतिक अस्थिरता और आवास क्षरण के कारण 157000 वर्ग किलोमीटर के संभावित बाघ आवास के बड़े हिस्से अभी भी बाघों से रहित ही हैं।

अध्ययन ने संरक्षित क्षेत्रों और आवास गलियारों का विस्तार करने, अवैध रूप से हो रहे इनके शिकारों को रोकने, बाघ आवासों के पास रहने वाले समुदायों के लिए स्थायी आजीविका को बढ़ावा देने, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और त्वरित प्रतिक्रिया टीमों सहित मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने की रणनीतियों को बढ़ाने की सिफारिश की है।

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