बिहार कांग्रेस ने पीएम मोदी और उनकी मां का जो एआई वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है, उसको लेकर सियासी बवाल तो खड़ा ही हो गया है, लेकिन इससे कानूनी तौर पर पार्टी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. किसी की सहमति के बिना ऐसे AI वीडियो तैयार करना और उससे किसी की छवि बिगाड़ने का प्रयास करने पर कानूनी कार्रवाई जा सकती है. बिहार कांग्रेस की ओर से ट्वीट किए गए इस वीडियो में पीएम मोदी और उनकी दिवंगत मां हीराबेन को दिखाया गया है. इसमें हीराबेन पीएम मोदी से तीखे सवाल करते हुए दिखाई पड़ रही हैं.

ये इलेक्ट्रानिक धोखाधड़ी है
साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल का कहना है कि हमारे देश में आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस को लेकर समर्पित कोई विशिष्ट कानून तो नहीं है, लेकिन ऐसे AI वीडियो बनाना और उससे किसी की नकारात्मक छवि पेश करना कानूनन अपराध है. हालांकि ऐसे एआई जनरेटेड डीप फेक वीडियो को लेकर आईटी ऐक्ट 2000 और भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. यह एक तरह की इलेक्ट्रॉनिक फोर्जरी(धोखाधड़ी)  है. खुद ऐसे वीडियो बनाना या डीप फेक टेक्नोलॉजी के जरिये ऐसा करने पर आरोपी पर मुकदमा दर्ज किया जा सकता है.

दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता वरुण दीक्षित का कहना है कि भारत में ऐसे डीपफेक वीडियो को लेकर कोई विशिष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है, लेकिन भारतीय न्याय संहिता की कई धाराओं के तहत यह अपराध की श्रेणी में आता है. सेक्शन 356(1) मानहानि के तहत, जो कोई भी बोले गए या पढ़े जाने वाले शब्दों द्वारा, या संकेतों या तस्वीरों द्वारा, किसी व्यक्ति के संबंध में कोई लांछन लगाता है या प्रकाशित करता है … जिससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है, तो यह कहा जाता है कि उसने उस व्यक्ति को बदनाम किया है. सेक्शन 356(2) के तहत मानहानि या अपमान के ऐसे केस में 2 साल तक जेल या जुर्माना या दोनों हो सकता है.
3 साल सजा और जुर्माने का प्रावधान
IT ACT 2000 की धारा 66डी के तहत इसमें 3 साल सजा और जुर्माने का प्रावधान है. हालांकि ये जमानती अपराध है. वहीं आईटी ऐक्ट की धारा 66 सी के तहत भी मामला बनता है. ये धारा कहती है कि अगर आप किसी की आइडेंटिटी (पहचान) को चुराते हैं और गलत तरीके से उसका इस्तेमाल कर अनुचित लाभ लेते हैं तो ये साइबर अपराध है. इसके तहत भी 3 साल की सजा का प्रावधान है.

मानहानि का मामला भी संभव
किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना और उसकी छवि का बेजा इस्तेमाल कर उसके खिलाफ गलत प्रचार करना एक तरह से मानहानि भी है. यह उस शख्स की गलत धारणा आम जनता के दिलोदिमाग में बना सकता है. BNS के तहत ये अपराध की श्रेणी में आता है. किसी की भी सहमति के बिना ऐसे AI वीडियो बनाना और उसे पोस्ट करना- आपको जेल पहुंचा सकता है. पुलिस आपके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर सकती है और क्रिमिनल कोर्ट ऐसे मामलों में सजा सुना सकती है.

एडवोकेट वरुण दीक्षित के अनुसार,  बीएनएस के सेक्शन 336(2) के तहत जालसाजी या झूठा दस्तावेज बनाना, जैसे किसी व्यक्ति को गलत तरीके से प्रस्तुत करने के लिए वीडियो को डिजिटल रूप में बदल दिया जाता है, तो इसे इलेक्ट्रॉनिक ‘जाली दस्तावेज’ के रूप में देखा जा सकता है. इसमें भी 2 साल जेल और जुर्मान या दोनों संभव है.संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, इसमें व्यक्ति की प्रतिष्ठता और गरिमा भी शामिल है.

अनुच्छेद 19 (1)(ए) के तहत भी वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी मिली है.अनुच्छेद 32 के तहत इससे पीड़ित व्यक्ति ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से ऐसे वीडियो हटाने के लिए याचिका दाखिल कर सकता है. ऐसे करने वालों के खिलाफ सजा की मांग कर सकता है. पीड़ित ऐसे वीडियो हटाने के लिए गूगल, फेसबुक और अन्य इंटरमीडियरी एजेंसियों से ऐसा कंटेंट, तस्वीरें और वीडियो हटाने के लिए कह सकता है.

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