नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लगे उत्तर प्रदेश के शहर नोएडा में प्रॉपर्टी की कीमतें (Property Price in Noida) आसमान छू रही हैं। इस स्थिति में डेवलपर्स को खरीदार नहीं मिल रहे हैं। हालत यह है कि नोएडा को ग्रेटर नोएडा से जोड़ने वाले एक्सप्रेसवे पर प्रॉपर्टी की कीमतें 25,000 रुपये प्रति वर्ग फुट से ऊपर चली गई हैं। इसका मतलब है कि 1,000 वर्ग फुट का एक सामान्य फ्लैट खरीदने के लिए आपको 2.5 करोड़ रुपये देने होंगे।

बिल्डर छोटे फ्लैट बना ही नही रहे

लेकिन 99acres की सुरभि गुप्ता (Surbhi Gupta) बिल्डरों की ट्रेंड के बारे में बताती हैं। उनका कहना है कि अब कोई भी डेवलपर 1,000 वर्ग फुट के घर बना ही नहीं रहा है। गुप्ता का कहना है कि नोएडा में बिल्डर सिर्फ बहुत बड़े फ्लैट ही बना रहे हैं। उन्होंने लिंक्डइन पर लिखा, ‘बिल्डर सिर्फ बड़े साइज के फ्लैट लॉन्च कर रहे हैं। तीन, चार और यहां तक कि 5 BHK, जिनका कारपेट एरिया 2,000 वर्ग फुट से शुरू होता है।’ इसका मतलब है कि अब एंट्री-लेवल के मकानों की कीमत 5 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई है। यह कीमत ज्यादातर असली मकान खरीदारों की पहुंच से बहुत बाहर है।

कौन खरीद सकते हैं मकान

आप खुद समझिए कि 2.5 करोड़ रुपये का फ्लैट खरीदने के लिए, खरीदार के पास लगभग 50 लाख रुपये नकद होने चाहिए। यही नहीं, उनकी सालाना कमाई लगभग 50 लाख रुपये होनी चाहिए, ताकि वह इतना बड़ा लोन ले सके। 5 करोड़ रुपये वाले फ्लैट के लिए तो यह पैसों की जरूरत और भी ज्यादा है।

तभी तो असली खरीदार गायब हैं

गुप्ता कहती हैं कि प्रॉपर्टी की इतनी ज्यादा कीमत होने की वजह से असली खरीदार बाजार में बहुत कम हैं। उन्होंने कहा, ‘मकानों के असली खरीदार वास्तव में बहुत कम हैं। ज्यादातर बुकिंग इन्वेस्टर्स कर रहे हैं जो 20 फीसदी डाउन पेमेंट करते हैं। फिर वे कीमतों के बढ़ने का इंतजार करते हैं, और जब उन्हें कोई दूसरा खरीदार मिल जाता है तो वे निकल जाते हैं।’ निवेशकों का यह खेल कीमतों को और बढ़ा रहा है। लेकिन इससे असली लोग मकानों में रहने नहीं आ रहे हैं। फ्लैट एक हाथ से दूसरे हाथ में जा रहे हैं, लेकिन खाली पड़े हैं। गुप्ता के अनुसार, अक्सर इसके दो ही नतीजे निकलते हैं: या तो बिल्डर प्रॉपर्टी वापस खरीद लेता है और उसे अपने पास रखता है, या निवेशक अगली किस्त नहीं दे पाता और उसे नुकसान में बेचना पड़ता है।

प्रोजेक्ट बन जाता है भूतिया

सबसे खराब स्थिति में, प्रोजेक्ट ‘भूतिया शहर’ बन सकता है। उन्होंने समझाया, ‘इतनी बढ़ी हुई कीमतों के लिए कोई असली खरीदार नहीं है। या इससे भी बुरा, निर्माण धीमा हो जाता है या रुक जाता है क्योंकि बिल्डर के पास पैसे खत्म हो जाते हैं।’ यह हाल उन बाजारों जैसा है जहां प्रॉपर्टी की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं और सट्टेबाजी चलती है। असली मांग की जगह प्रॉपर्टी को जल्दी-जल्दी खरीदकर बेचना (flipping) हावी हो जाता है। नतीजतन, प्रोजेक्ट कागजों पर बिक जाते हैं लेकिन जमीन पर खाली रहते हैं।

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