इसी तरह अमेरिका अन्य कृषि उत्पादों का भी अधिशेष उत्पादन कर रहा है, जिसके लिए वह नए विदेशी बाजार तलाश रहा है। यही कारण है कि अमेरिका भारतीय बाजार में अपने कृषि उत्पादों के लिए आक्रामक रूप से प्रवेश चाहता है…
कुछ दिन पहले भारत ने न्यूजीलैंड के साथ एक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इससे पहले भारत ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम (यूके), संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन, ओमान तथा अन्य देशों के साथ भी एफटीए कर चुका है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस बात को कुछ हैरानी से देखा जा रहा है, जबकि नवंबर 2019 में भारत ने स्वयं को रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) से बाहर कर लिया था, जहां ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दोनों शामिल थे। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि भारत ने अब इन्हीं देशों के साथ अलग-अलग एफटीए कैसे कर लिए। आरसीईपी एक प्रस्तावित व्यापक व्यापार समझौता था, जिसमें मुक्त व्यापार से जुड़े प्रावधान शामिल थे। इसमें 16 देश- 10 आसियान देश, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और भारत भागीदार थे। इस समझौते पर लगभग आठ वर्षों तक बातचीत चली। आम तौर पर यह माना जाता है कि भारत ने आरसीईपी से बाहर निकलने का निर्णय इसलिए लिया क्योंकि समझौते का अंतिम प्रारूप भारत की अपेक्षाओं और हितों के अनुरूप नहीं था। 4 नवंबर 2019 को आरसीईपी शिखर सम्मेलन में भाग लेते हुए प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि उनकी अंतरात्मा उन्हें इस समझौते पर हस्ताक्षर करने की अनुमति नहीं देती।
उन्होंने यह भी कहा कि महात्मा गांधी की शिक्षाओं ने उन्हें इस समझौते से पीछे हटने के लिए प्रेरित किया। अब सवाल यह है कि प्रधानमंत्री को अंतिम क्षण में इस समझौते से पीछे हटने का साहसिक कदम कैसे लिया? संभवत: यह विश्व इतिहास में पहली बार था जब किसी सरकार के मुखिया ने वर्षों की बातचीत और अंतिम मसौदा तैयार होने के बाद भी, शिखर सम्मेलन में अन्य सभी नेताओं के सामने यह घोषणा की कि उनका देश इस समझौते में शामिल नहीं होगा। वास्तव में, डेयरी और कृषि ऐसे दो प्रमुख क्षेत्र थे, जिन पर भारत ने कठोर रुख अपनाया। न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया की मांग थी कि आरसीईपी के सदस्य देश अपने डेयरी और कृषि बाजारों को अन्य देशों के लिए खोलें। आरसीईपी से भारत के बाहर निकलने और बाद में ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड के साथ अलग-अलग मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) करने के बीच जो विरोधाभास दिखाई देता है, उसे समझने के लिए आरसीईपी की संरचना को समझना आवश्यक है। आरसीईपी में जो 16 देश शामिल थे, इनमें से 10 आसियान देशों के साथ भारत के पहले से ही मुक्त व्यापार समझौते मौजूद थे। इसके अलावा जापान और दक्षिण कोरिया के साथ भी भारत के एफटीए पहले से लागू थे। वहीं, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी भारत की द्विपक्षीय एफटीए वार्ताएं अलग-अलग चल रही थीं। इस परिप्रेक्ष्य में केवल एक ही ऐसा देश बचता था, जिसके साथ मुक्त व्यापार समझौता भारत के लिए गंभीर जोखिम माना जा रहा था, और वह देश था चीन। इसलिए भारत ने आरसीईपी जैसे बहुपक्षीय समझौते से बाहर निकलने का विवेकपूर्ण निर्णय लिया और इसके बजाय ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड के साथ अलग-अलग, द्विपक्षीय समझौते करने का रास्ता चुना। जब भारत ने अप्रैल 2022 में ऑस्ट्रेलिया के साथ एफटीए पर हस्ताक्षर किए, तो कई लोगों को हैरानी हुई कि कृषि और डेयरी को बाहर रखते हुए यह समझौता कैसे किया गया। हालांकि, इस कदम की व्यापक सराहना भी हुई। अब जब न्यूजीलैंड के साथ भी मुक्त व्यापार समझौता किया गया है, और उसमें भी कृषि तथा डेयरी क्षेत्रों को बाहर रखा गया है, तो यह दृष्टिकोण और अधिक पुष्ट हो जाता है कि भारत मुक्त व्यापार समझौतों पर बातचीत करते समय अत्यंत सतर्क रहा है और उसने संवेदनशील क्षेत्रों, विशेष रूप से कृषि और डेयरी को बाहर रखने में सफलता हासिल की है। अब प्रश्न यह उठता है कि भारत जैसे देश के लिए कृषि और डेयरी की सुरक्षा को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है। आलोचक अक्सर तर्क देते हैं कि यदि कृषि और डेयरी को मुक्त व्यापार समझौतों में शामिल किया जाए, तो इससे भारतीय कृषि और डेयरी की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। उनका यह भी कहना है कि जब भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, तो उसे विदेशी प्रतिस्पर्धा से डरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
आजीविका और खाद्य सुरक्षा : संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल दुग्ध उत्पादन का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा छोटे और सीमांत किसानों तथा भूमिहीन श्रमिकों से आता है, जिनके पास औसतन केवल एक या दो दुधारू पशु होते हैं। इनके लिए दूध केवल अतिरिक्त आय का साधन नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन का आधार है। यह ध्यान देने योग्य है कि भारत की लगभग आधी आबादी कृषि पर निर्भर है और 8 करोड़ से अधिक परिवार यानी 36 करोड़ लोग डेयरी क्षेत्र से जुड़े हैं। इसके विपरीत, अमेरिका और न्यूजीलैंड जैसे देशों में डेयरी एक व्यापार-केंद्रित उद्योग है, जहां उत्पादन का उद्देश्य मुख्यत: निर्यात और मुनाफा होता है, न कि व्यापक ग्रामीण आजीविका। निस्संदेह, भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक होने का गौरव प्राप्त है। मात्रा की दृष्टि से देखें, तो लीटर में दुग्ध उत्पादन कई प्रमुख कृषि फसलों के किलोग्राम में उत्पादन से भी अधिक है। भारत में अधिक दूध उत्पादन के पीछे प्रमुख कारण यह है कि देश में दुग्ध उत्पादों, विशेषकर दूध, के दाम अपेक्षाकृत लाभकारी हैं, जिससे छोटे उत्पादकों को उत्पादन के लिए प्रोत्साहन मिलता है। यह भी सर्वविदित है कि भारत और न्यूजीलैंड के बीच दुग्ध उत्पादों, विशेषकर मिल्क पाउडर, की कीमतों में भारी अंतर है। यदि न्यूजीलैंड का दूध या दूध पाउडर बिना शुल्क के भारत में आने लगे, तो घरेलू बाजार में कीमतों में तेज गिरावट आएगी। इसका सीधा परिणाम यह होगा कि देश के लाखों छोटे दुग्ध उत्पादक उत्पादन बंद करने को मजबूर हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में भारत न केवल दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बने रहने का दर्जा खो देगा, बल्कि यहां एक गंभीर खाद्य सुरक्षा संकट भी उत्पन्न हो सकता है। यह समझना आवश्यक है कि दुनिया का कोई भी देश, चाहे वह कृषि उत्पाद हो या दूध, भारत जैसे विशाल देश की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता। इसलिए डेयरी क्षेत्र की सुरक्षा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि आजीविका और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा से जुड़ा हुआ प्रश्न भी है।
़अमेरिका के साथ समझौता और कृषि : ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए टैरिफ के बाद भारत और अमेरिका, दोनों ही, एक व्यापक व्यापार समझौते पर पहुंचने के प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा कृषि क्षेत्र बनकर उभरी है। यह उल्लेखनीय है कि अमेरिका, ब्राजील के बाद, सोयाबीन का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। ट्रंप टैरिफ के बाद चीन, जो अमेरिकी सोयाबीन का सबसे बड़ा आयातक था, ने अमेरिका से आयात में भारी कटौती कर दी है। इसी तरह अमेरिका अन्य कृषि उत्पादों का भी अधिशेष उत्पादन कर रहा है, जिसके लिए वह नए विदेशी बाजार तलाश रहा है। यही कारण है कि अमेरिका भारतीय बाजार में अपने कृषि उत्पादों के लिए आक्रामक रूप से प्रवेश चाहता है, जबकि भारत इसका सख्त विरोध कर रहा है। भारत के इस विरोध के पीछे मुख्यत: दो कारण हैं। पहला, यदि भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों को बाजार में प्रवेश की अनुमति देता है, जो अमेरिकी सरकार द्वारा भारी सब्सिडी से समर्थित हैं, तो भारतीय किसान इस असमान प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं कर पाएंगे और उत्पादन बंद करने को मजबूर हो सकते हैं। दूसरा, अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खोलने से भारत की जैव-सुरक्षा और बीज संप्रभुता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
डा. अश्वनी महाजन














