हमें तो ईरान वालों के लिए सॉरी फील हो रहा है, बुरा सा लग रहा है। नहीं, नहीं, हम किसी को सॉरी नहीं बोल रहे हैं। हम किसी को सॉरी बोलने नहीं जाते। किसी को भी नहीं। फिर ईरान वाले तो आते ही किस गिनती में हैं। पहले कभी किसी से सॉरी बोला होगा तो बोला होगा, पर मोदी युग में तो सॉरी बोलने का कोई सवाल ही नहीं उठता है। मोदी कुल रीति सदा चली आयी, न इस्तीफा देब, न माफी मांगी जाई! 

जब मोदी जी ने 2002 के गुजरात के नरसंहार के लिए माफी नहीं मांगी, जब मोदी जी ने नोटबंदी के लिए माफी नहीं मांगी, जब मोदी जी ने कोरोना के टैम में दवा, आक्सीजन, अस्पताल में बैड के अभाव में तड़प-तड़प कर दम तोड़ने वालों के घरवालों से, लॉकडाउन में सैकड़ों किलोमीटर पैदल घिसट-घिसट कर शहरों से गिरते-पड़ते गांव-घर तक पहुंचने वाले मजदूरों से माफी नहीं मांगी, जब मोदी जी ने इलैक्टोरल बांड के गैर-कानूनी हथियार के जरिए, हजारों करोड़ रुपये की अवैध वसूली के लिए माफी नहीं मांगी और तो और सवा साल दिल्ली के बार्डरों पर डटे रहे किसानों से बिना अगर-मगर लगाए माफी नहीं मांगी, तो उनके प्रजा जन कैसे माफी मांगेंगे?

और माफी भी ईरान से। और वह भी सिर्फ इसलिए कि उस पर जब इलाके से बाहर वालों ने हमला किया, तो हमारे मुंह से विरोध के दो शब्द तक नहीं निकले। जब उसके सबसे बड़े नेता की निशाना साधकर हत्या कर दी गयी, तो हमारे नेता से शोक तक नहीं जताया गया। अब विरोध करना, शोक जताना और पड़ोसी का साथ देना और किसी वजह से ऐसा न कर पाएं तो माफी मांगना, ये सब तो नैतिक तकाजे हैं, जिनसे गांधी-नेहरू के टैम वाला पुराना भारत चला करता था। 

यह मोदी जी का नया भारत है, जो नैतिकता वगैरह के चक्करों में नहीं फंसता। बस बड़े सेठों का मुनाफा देखता है। तभी तो बाकी दुनिया में कुछ भी होता रहे, नया भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के रास्ते पर बढ़ता चला जा रहा है। नैतिकता के चक्कर में हिचकने वालों को पीछे छोड़ता जा रहा है। नैतिकता के चक्करों में ही पड़े रहते, तब तो हमें भी पीछे छोडक़र कोई और आगे निकल गया होता। मोदी जी के यशस्वी नेतृत्व में 2047 तक विकसित देश बनने के रास्ते पर बढ़ते भारत के ऐसा करने का तो सवाल ही नहीं उठता है।

हम तो सिर्फ इतना कह रहे हैं कि हमें भी बुरा सा लग रहा है। हमें भी बुरा लग रहा है कि हमले के पहले ही दिन अमेरिका के बमों ने मीनाब में छोटी बच्चियों के एक स्कूल को निशाने पर ले लिया और एक साथ 165 छोटी-छोटी बच्चियों को मौत की नींद सुला दिया। आखिर, इन छोटी बच्चियों ने किसी का क्या बिगाड़ा था? हमें भी बुरा लग रहा है कि भारत में एक संयुक्त नौसैनिक आयोजन से लौटते हुए, ईरान के एक युद्धपोत को, जो एक प्रकार से निहत्था था, हमारे पास के समंदर में, जहां हम समुद्री सुरक्षा मुहैया कराने की ठेकेदारी के हौसले जताते आए थे, एक अमेरिकी पनडुब्बी ने डुबो दिया और करीब एक सौ चालीस ईरानी नौसैनिकों को समंदर में मरने के लिए ही छोड़ दिया। वह तो श्रीलंका की नौसेना ने बत्तीस-चौतीस नौसैनिकों को बचा लिया, वर्ना अपने बाकी साथियों के साथ ही उनकी भी जल-समाधि हो जाती। मरने वाले  नौसैनिक तो भारत में ही एक समारोही आयोजन में हिस्सा लेकर अपने घर लौट रहे थे, उनके लिए बुरा लगता है। हम तो कहेंगे कि इस लड़ाई में ईरान में भी और ईरान पर हमला करने वालों तथा उनकी मदद करने वाले देशों में भी, जितने लोग भी मरे हैं, जितने भी घायल हुए हैं और जितना भी नुकसान हुआ है और आगे होगा, उसके लिए हमें बुरा लगता है। मोदी जी गलत थोड़े ही कहते हैं, हम बुद्ध के देश से हैं, न कि युद्ध के देश से!

हमें ईरान वालों के लिए बुरा इसलिए और भी लग रहा है कि, वे बड़ी आसानी से खुद भी इस युद्ध की आफत से बच सकते थे और बाकी दुनिया को भी इस मुसीबत से बचा सकते थे। और जब हम बाकी दुनिया कहते हैं, तो शब्दश: सारी दुनिया को मुसीबत से बचाने की बात करते हैं। देखा नहीं, कैसे तेल के चक्कर में सारी दुनिया की इकोनॉमी की वॉट लगी पड़ी है और वह भी सिर्फ एक हफ्ते की लड़ाई में। ट्रंप साहब की मानें तो उनकी तैयारी महीने भर से भी ज्यादा की है। यानी सारी दुनिया की इकोनॉमी का तो कबाड़ा ही होने वाला समझिए। पर ईरान वाले इससे आसानी से खुद भी बच सकते थे और बाकी दुनिया को भी बचा सकते थे। जाहिर है कि बाकी दुनिया में वो खाड़ी देश भी आते ही हैं, जो अमेरिका और ईरान की लड़ाई में सिर्फ इसलिए पिस रहे हैं कि अमेरिका को ईरान को निशाना बनाने के लिए उनके ठिकानों और तरह-तरह की सहूलियतों का सहारा लेना पड़ रहा है। उस बेचारे को खाड़ी की पंचैती करने के लिए, अपने लाव-लश्कर के साथ, हजारों किलोमीटर दूर से जो आना पड़ता है।

ईरान वाले दुनिया को इस मुसीबत से बचा सकते थे, कैसे? सिंपल है। विश्व गुरु का दिखाया रास्ता अपना कर। ईरान को ज्यादा अपना दिमाग लगाने की जरूरत ही नहीं थी। बस भारत जो-जो करता  रहा है, वही-वही करना था। स्वतंत्रता, संप्रभुता सब भूल जाते, जो ट्रम्प साहब कहते, यस सर कहकर मान लेते।  ट्रम्प साहब कहते कि हमारा पट्ठा  नेतन्याहू जो कहे, पहले वह मानकर दिखाओ, तो नेतन्याहू जो कहता मानकर दिखा देते। ट्रंप-नेतन्याहू कहते कि ईरान में राजशाही को वापस ले आओ, तो राजशाही वापस ले आते। ट्रंप साहब कहते कि अपना तेल, हमारी बड़ी तेल कंपनियों के हवाले कर दो, तो कर देते। ट्रंप और नेतन्याहू कोई पागल तो हैं नहीं कि फिर भी ईरान पर हमला करते। ईरान को भी खाड़ी देशों के अमेरिकी अड्डों पर हमला नहीं करना पड़ता। पर नहीं, ईरान वालों को तो अपने ही मन की करनी थी। विश्व गुरु का उदाहरण सामने था, पर नहीं उन्हें तो विश्व बॉस की इच्छा अनसुनी करनी थी। सो भुगत रहे हैं और अपने साथ बाकी सारी दुनिया को भी भुगतवा रहे हैं। और लड़ाई में  विश्व बॉस का कुछ बिगड़े न बिगड़े, कम से कम सारी दुनिया में विश्व बॉस के साथ-साथ विश्व गुरु की भी थू-थू तो करा ही रहे हैं।

ईरानियो, इतने वार सहकर अब तो संभल जाओ। कम से कम स्वतंत्रता, संप्रभुता वगैरह की गुजरे जमाने की बातें पब्लिक को याद दिलाकर, विश्व गुरु का नाम बदनाम ना करो। -राजेंद्र शर्मा

Advertisement Carousel
Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
August 2026
M T W T F S S
 12
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31