डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) से अलग कर लिया है. ट्रंप प्रशासन ने इसके पीछे 3 बड़े कारण बताए हैं. लेकिन असल में हकीकत तो कुछ और ही है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के कई डर हैं, जो उन्हें ग्रीन एनर्जी की तरफ शिफ्ट होने से रोकते हैं. इसके अलावा उनके मंसूबे दुनिया को अपनी उंगली पर हमेशा नचाते रहने के भी हैं. डिटेल में जान लीजिए.
8 जनवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक एक्जीक्यूटिव ऑर्डर से अमेरिका को इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) से अलग कर दिया. केवल इसी से नहीं, बल्कि 66 ऐसे ही अलग-अलग इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन्स से भी बाहर निकल गए. ट्रंप सरकार ने सोलर अलायंस (ISA) से बाहर निकलने के पीछे कई कारण गिनाए हैं, लेकिन यह मसला उतना भी सरल नहीं है, जितना दिखाने के कोशिश की गई है. ट्रंप का यह फैसला वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था की बिसात पर चली गई एक बड़ी चाल है. इसे समझने के लिए उनके बताए कारणों से दूर हटकर ‘पैसे और पावर’ के चश्मे से देखना होगा. तभी जाकर क्लीयर होगा कि यह फैसला क्यों लिया गया और इसमें अमेरिका का क्या नफा-नुकसान है.
बता दें कि ISA एक वैश्विक संगठन है, जो सोलर एनर्जी को बढ़ावा देता है, और इसे भारत और फ्रांस ने मिलकर शुरू किया था. बताया गया कि यह फैसला क्लाइमेट और एनर्जी पॉलिसी से जुड़ा है. पहले ये जान लेते हैं कि ट्रंप प्रशासन ने दुनिया को क्या आधिकारिक कारण बताए? उसके बाद देखेंगे कि ट्रंप के असली मंसूबे क्या हैं?
ISA से बाहर होने के तीन मुख्य कारण
- अमेरिका फर्स्ट (America First): ट्रंप का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों में अमेरिका का पैसा खर्च होता है, जबकि फायदा दूसरे देशों को मिलता है. वे इसे ‘खर्चीला’ बताते हैं.
- चीन का दबदबा: सोलर पैनल और इसकी तकनीक पर फिलहाल चीन का कब्जा है. डोनाल्ड ट्रंप का तर्क है कि सोलर अलायंस को बढ़ावा देने का सीधा मतलब चीन की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है.
- संप्रभुता (Sovereignty): अमेरिकी राष्ट्रपति का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय संगठन अमेरिका की एनर्जी पॉलिसी में दखल देते हैं, जो उन्हें मंजूर नहीं है.
असली मंसूबे: पर्दे के पीछे का सच
दिखावे के लिए कारण कुछ भी हों, लेकिन ट्रंप के असली मंसूबे पूरी तरह से अमेरिकी आर्थिक प्रभुत्व पर टिके हैं. चलिए उनके इस फैसले के ऊपर चढ़ी परतों को खोलते हैं.
1. फॉसिल फ्यूल लॉबी का दबाव: चुनावी निवेश का कर्ज
राजनीति में कोई भी फैसला बिना फाइनेंशियल हितों के नहीं होता. ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को फंड देने वाले सबसे बड़े दानदाताओं में तेल (Oil), गैस और कोयला कंपनियों के मालिक शामिल हैं. ये कंपनियां अरबों डॉलर का निवेश इस उम्मीद में करती हैं कि सरकार ऐसी नीतियां बनाएगी, जिससे तेल और कोयले की मांग बनी रहे.
ट्रंप की मजबूरी है कि वे ऐसी कंपनियों के हित में फैसला लें. ऐसे में सोलर अलायंस को बढ़ावा देने का मतलब है कि अपनी ही तिजोरी भरने वाली कंपनियों की जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाना. ट्रंप चाहते हैं कि जब तक धरती के नीचे तेल की एक बूंद भी बाकी है, दुनिया उसे खरीदने के लिए मजबूर रहे.
2. एनर्जी में डोमिनेंस: अमेरिका का नया हथियार
ट्रंप का विजन अमेरिका को केवल आत्मनिर्भर बनाना नहीं, बल्कि दुनिया का ‘एनर्जी किंग’ बनाना है. अमेरिका आज दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस उत्पादकों में से एक है. अगर दुनिया सोलर एनर्जी की तरफ मुड़ गई, तो अमेरिका के पास मौजूद खरबों डॉलर के तेल के कुएं और रिफाइनरियां ‘कबाड़’ बन जाएंगी. दूसरी तरफ, सूर्य की रोशनी पर किसी का कंट्रोल नहीं है, लेकिन तेल की पाइपलाइनों और समुद्री रास्तों पर अमेरिका का दबदबा है. ट्रंप इस दबदबे को खोना नहीं चाहते.
3. ग्रीन एनर्जी से खो सकता है ट्रंप का वोट बैंक
अभी तक दुनिया यह तो समझ ही चुकी है कि डोनाल्ड ट्रंप एक चालाक बिजनेसमैन हैं. वे जानते हैं कि उनकी सत्ता की चाबी कहां है. टेक्सास, पेंसिल्वेनिया और वेस्ट वर्जीनिया जैसे अमेरिकी राज्य पूरी तरह तेल और कोयला खनन पर निर्भर हैं. ऐसे में अगर ट्रंप सोलर अलायंस का समर्थन करते हैं, तो इन राज्यों में रातों-रात लाखों नौकरियां खतरे में पड़ जाएंगी. ट्रंप के लिए ‘क्लाइमेट चेंज’ से बड़ा खतरा अपना ‘वोट बैंक’ खोना है. वे ग्रीन जॉब्स के वादे को एक अनिश्चित भविष्य मानते हैं, जबकि तेल की नौकरियां वर्तमान की सच्चाई हैं.
4. पेट्रो-डॉलर (Petrodollar) को खतरा
आज पूरी दुनिया में तेल का व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है. इसे ही ‘पेट्रो-डॉलर’ कहते हैं. इसकी वजह से हर देश को अपने पास डॉलर का रिजर्व रखना पड़ता है, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत रहती है. अगर दुनिया सोलर या इलेक्ट्रिक एनर्जी पर शिफ्ट हो गई, तो तेल की मांग गिरेगी. तेल की मांग गिरी, तो डॉलर की मांग गिरेगी. और अगर डॉलर कमजोर हुआ, तो अमेरिका की ग्लोबल सुपरपावर वाली हैसियत भी खत्म हो जाएगी.
5. वेनेजुएला और मादुरो की कड़ियां
हाल ही में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई (गिरफ्तारी के आदेश और दबाव) इसी बड़े खेल का हिस्सा है. वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है. मादुरो अमेरिका के विरोधी थे और वे रूस-चीन के साथ मिलकर ‘तेल का खेल’ खेल रहे थे.
एक तरफ ट्रंप सोलर अलायंस को कमजोर कर रहे हैं, ताकि तेल की मांग बनी रहे, और दूसरी तरफ वे वेनेजुएला जैसे देशों के तेल पर अपना नियंत्रण चाहते हैं. मादुरो को हटाकर वहां अपने समर्थक को बिठाना, अमेरिकी तेल व्यापार के भविष्य को सुरक्षित करना है.
अमेरिकी इकॉनमी के लिए ‘ग्रीन शिफ्ट’ का खतरा
1. खरबों डॉलर डूबने से 2008 जैसी मंदी का डर
अमेरिका ने पिछले कई दशकों में अपनी पूरी अर्थव्यवस्था को जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के इर्द-गिर्द बुना है. देशभर में बिछी लाखों मील लंबी तेल और गैस पाइपलाइनें, विशाल रिफाइनरियां, और बंदरगाहों पर बने निर्यात टर्मिनल महज ढांचे नहीं हैं, बल्कि उनमें अमेरिकी बैंकों और निवेशकों के खरबों डॉलर लगे हुए हैं.
यदि दुनिया और खुद अमेरिका तेजी से ग्रीन एनर्जी की ओर मुड़ जाता है, तो ये सारा निवेश रातों-रात ‘डेड इन्वेस्टमेंट’ या बेकार पड़े एसेट्स में बदल जाएगा. ट्रंप का मानना है कि इतनी बड़ी पूंजी का अचानक मूल्यहीन हो जाना अमेरिकी वित्तीय बाजार में वैसी ही मंदी ला सकता है, जैसी 2008 के संकट के दौरान देखी गई थी. तेल कंपनियों के डूबने का सीधा असर वॉल स्ट्रीट और आम अमेरिकियों के पेंशन फंड्स पर पड़ेगा, जो ट्रंप के लिए काल से कम नहीं होगा.
2. चीन की बढ़त और नई ‘सुपरपावर’ की चुनौती
आज के दौर में सोलर पैनल, लिथियम-आयन बैटरी और इलेक्ट्रिक व्हीकल की मैन्युफैक्चरिंग चेन पर चीन का लगभग एकाधिकार है. चीन ने पिछले दो दशकों में सोलर तकनीक और उसके कच्चे माल (जैसे रेयर अर्थ मेटल्स) की सप्लाई चेन को नियंत्रित करने के लिए भारी निवेश किया है. ऐसा करके वह इस क्षेत्र में अमेरिका से कम से कम एक दशक आगे निकल चुका है.
ऐसे में यदि दुनिया ग्रीन एनर्जी को पूरी तरह अपनाती है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार की चाबी वाशिंगटन के हाथ से निकलकर बीजिंग के पास चली जाएगी. ट्रंप की नजर में ग्रीन एनर्जी की तरफ भागना दरअसल चीन की गुलामी स्वीकार करने जैसा है. अमेरिका कभी नहीं चाहेगा कि वह जिस तेल और गैस के दम पर आज दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाता है, उसकी जगह उसे भविष्य में ऊर्जा के लिए अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी चीन पर निर्भर रहना पड़े. इसलिए, ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत वे पुरानी ऊर्जा व्यवस्था (Oil & Gas) को ही बचाए रखना चाहते हैं, जहां अमेरिका का दबदबा आज भी कायम है.














