नई दिल्ली। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अभय एस. ओका की बेंच ने 23 मई 2025 को मैटरनिटी लीव पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने फिर एक बार कहा है कि मैटरनिटी लीव देना कोई एहसान नहीं, बल्कि एक कानूनी अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले को बदल दिया है, जिसमें हाई कोर्ट ने एक सरकारी स्कूल टीचर को राज्य की दो बच्चों वाली नीति के तहत मैटरनिटी लीव देने से मना कर दिया था।

‘मैटरनिटी लीव देना कोई एहसान नहीं’

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले को बदलते हुए कहा, ‘मैटरनिटी लीव किसी अधिकारी का दिया गया कोई एहसान या मनमर्जी का फायदा नहीं है, बल्कि यह एक महिला के प्रजनन अधिकारों से जुड़ा कानूनी अधिकार है।’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मैटरनिटी लीव, मैटरनिटी बेनिफिट्स का एक जरूरी हिस्सा है और यह महिलाओं के स्वास्थ्य, प्राइवेसी, समानता, गैर-भेदभाव और गरिमा के अधिकार से जुड़ा हुआ है। कोर्ट ने यह भी बताया कि ये सभी अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षित हैं।

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के लिखे गए इस फैसले पर जस्टिस अभय एस. ओका ने सहमति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने सर्विस नियमों, संवैधानिक गारंटी और मैटरनिटी वेलफेयर कानूनों के बीच के संबंध पर बहुत जरूरी स्पष्टता की बात की।

कोर्ट ने कहा कि दो बच्चों वाली नीति जैसी प्रशासनिक नीतियां एक महिला के मैटरनिटी बेनिफिट्स के अधिकार को खत्म नहीं कर सकतीं, खासकर जब ऐसे अधिकार संवैधानिक मूल्यों और मानवाधिकार सिद्धांतों से मिलते हों।

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