आर्टिकल- सरकार के दो परिवर्तनकारी कदमों—पीएम गति शक्ति और प्रगति—का विशाल परियोजनाओं की योजना बनाने, उन्हें कार्यान्वित करने और उनकी निगरानी करने पर गहरा असर पड़ा है। इस लेख में हम बाद वाले कदम के बारे में चर्चा कर रहे हैं।
प्रगति (प्रो-एक्टिव गवर्नेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन) प्रारूप के तहत आयोजित 50वीं उच्च-स्तरीय समीक्षा दर्शाती है कि शासन के प्रति भारत सरकार के रुख और उसे संचालित करने के तरीके में बहुत बड़ा बदलाव आया है। यह बदलाव नीयत से डिलिवरी की ओर, प्रक्रियागत अनुपालन से परिणामों की ओर तथा बिखरी हुई सत्ता से समन्वित एवं समयबद्ध कार्यान्वयन की ओर संकेत करता है। इस प्रकार प्रगति केवल एक प्रशासनिक नवाचार भर नहीं है; बल्कि यह शासन की संरचना की सोच-विचार कर की गई पुनर्रचना का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब शासन के अन्य मॉडल विफल रहे, तब यह मॉडल परिणाम देने में कैसे सफल हुआ?
प्रगति की आवश्यकता
सार्वजनिक परियोजनाओं में देरी होना लगभग आम बात रही है। फिर भी, शायद ही कभी इस देरी कारण नीति में स्पष्ट जानकारी या वित्तीय मंजूरी का अभाव रहा। शासन प्रणालियों का बिखराव इस देरी का कारण रहा है। मंत्रालय ऊपरी से निचले स्तर तक या वर्टिकली कार्य करते हैं; राज्य और केंद्र क्रमिक रूप से काम करते हैं; और विवाद निपटाने के अधिकार-संपन्न मंच न होने के कारण, विवाद लंबित पड़े रहते हैं। गतिविधियाँ बढ़ने के बावजूद जवाबदेही कमज़ोर होती जाती है। मुख्य समस्या कमज़ोर तालमेल और साइलो-बेस्ड समीक्षा तंत्र रही हैं।
इसके परिणामस्वरूप, परियोजना की डिलिवरी का व्यापक उद्देश्य अक्सर कहीं खो जाता है। कई परियोजनाएँ जमीनी विवाद, पर्यावरण या वन मंज़ूरी, नियामक अनुमोदन, संविदा से जुड़े विवादों या राज्यों के बीच तालमेल संबंधी चुनौतियों के कारण वर्षों तक अटकी रहीं। एक बहु-मंत्रालयीय और बहु-राज्यीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था में, जहाँ प्रत्येक संस्था अपने अधिकार क्षेत्र पर प्रभुत्व जमाए हुए होती है, किसी के लिए भी दूसरे को राजी करना कठिन हो जाता है।
जब परियोजना की पूर्ति में कई राज्यों और मंत्रालयों को योगदान देना होता है, तो बैठकें करने, चर्चा करने, फील्ड दौरे करने, समितियाँ बनाने और अंतहीन पत्राचार करने की पुरानी प्रक्रिया बेअसर साबित होती है। यह एक ऐसा तरीका था, जिसमें चर्चा को निर्णय, गतिविधि को काम, गति को प्रगति और केवल नीयत को उपलब्धि समझ लिया जाता था।
प्रगति का आगमन
प्रगति निर्णय लेने, समन्वय करने और लागू करने के तरीके को नए तरीके से डिजाइन कर लगातार बनी रहने वाली इन संरचनात्मक कमियों को दूर करता है। प्रणालीगत समन्वयक के रूप में काम करते हुए यह मंत्रालयों, राज्यों और जिलों के निर्णयकर्ताओं को एक ही संस्थागत और डिजिटल मंच पर लाता है। यह फ़ाइलों के आदान-प्रदान, क्षेत्राधिकार की अस्पष्टता और विभागीय पत्राचार के कारण होने वाली देरी को समाप्त करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कार्यान्वयन का विस्तृत दृष्टिकोण बहाल करता है, जिससे नेतृत्व फ़ाइलों की लंबित स्थिति के बजाय प्रणाली से संबंधित रुकावटों की पहचान कर सकता है।
प्रगति के तहत होने वाली समीक्षा की अध्यक्षता करने में माननीय प्रधानमंत्री की भूमिका इसकी सफलता के लिए बहुत जरूरी है। उनका सीधा जुड़ाव इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि डिलिवरी राष्ट्रीय प्राथमिकता है और कार्यान्वयन की विफलताओं पर सर्वोच्च स्तर पर ध्यान दिया जाएगा। यह निर्णायक कार्रवाई को सुगम बनाता है और समीक्षा को परिणामों के लिए एक बाध्यकारी ढांचे में बदल देता है। इन समीक्षाओं के दौरान लिए गए निर्णय अंतिम, समयबद्ध और डिजिटल रूप से रिकॉर्ड किए जाते हैं, जिससे जवाबदेही स्पष्ट और लागू करने योग्य होती है।
प्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण सक्षमकर्ता के रूप में कार्य करती है। रीयल-टाइम डेटा, जियो-स्पैशियल विज़ुअलाइज़ेशन और क्षेत्रीय अधिकारियों के साथ सीधे संवाद हितधारकों के बीच जानकारी की असमानता समाप्त करते हैं और निर्णयों को साक्ष्यों के आधार पर लिया जाना सुनिश्चित करते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रौद्योगिकी प्रशासनिक निर्णय क्षमता को बदलने के बजाय उसे सुदृढ़ करती है, जिससे प्रणाली के भीतर नेतृत्व की जिम्मेदारी और मजबूत होती है।
प्रगति में समापन पर जोर दिया जाता है और यही बात उसे पहले के समीक्षा तंत्रों से अलग बनाती है। समस्याएँ तब तक सक्रिय रहती हैं, जब तक उन्हें हल नहीं किया जाता, और उन्हें लगातार कैबिनेट सचिवालय और प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा ट्रैक किया जाता है। केवल स्पष्टीकरण देना अब परिणामों का विकल्प नहीं है। समय के साथ, इस अनुशासन ने प्रशासनिक व्यवहार को बदल दिया है, जिससे मंत्रालयों और राज्यों को समस्याओं का पूर्वानुमान लगाने और उन्हें बढ़ने से पहले हल करने की प्रवृत्ति बढ़ी है
परिणाम
परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं और आकलन करने योग्य हैं। 85 लाख करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं में तेज़ गति से काम हुआ गई है। हाल के वर्षों में, प्रगति के तहत पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय (एमओपीएसडब्ल्यू) की दस परियोजनाओं की समीक्षा की गई, जिससे अड़चनों का जल्द समाधान हुआ और तेज़ी से कार्यान्वयन संभव हुआ। मैं उदाहरण के रूप में दो परियोजनाओं को प्रस्तुत करूँगा।
लोथल में राष्ट्रीय समुद्री धरोहर परिसर (एनएमएचसी) एक विशाल परियोजना है, जिसमें केंद्र सरकार के संस्कृति, रक्षा, विदेश, रेल और राजमार्ग जैसे कई मंत्रालयों के साथ-साथ गुजरात सरकार भी शामिल हैं। साथ ही, कई तटीय राज्यों के पवेलियन स्थापित किए जाने हैं, इसलिए संबंधित राज्य भी इस परियोजना का हिस्सा हैं। पिछले वर्ष एनएमएचसी परियोजना को प्रगति के एजेंडे में शामिल करने से कई स्तरों पर तुरंत कार्रवाई शुरू हो गई। सामान्यतः एजेंडे को प्रधानमंत्री द्वारा समीक्षा से कुछ महीने पहले सूचित किया जाता है, जिससे विभिन्न हितधारकों को प्राथमिकता के साथ मुद्दों को हल करने का अवसर मिलता है। परिणामस्वरूप, ज्यादातर मुद्दे जो आधिकारिक/मंत्रालय स्तर पर हल किए जा सकते हैं, पहले ही सुलझ जाते हैं और केवल मार्गदर्शन या दिशा की आवश्यकता वाले शेष जटिल मुद्दे ही वास्तविक समीक्षा के दौरान उठाए जाते हैं।
इसी तरह, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से गुजरने वाले राष्ट्रीय जलमार्ग (एनडब्ल्यू)-1 पर लागू की जा रही जल मार्ग विकास परियोजना की प्रगति के तहत दो बार समीक्षा की गई। यह परियोजना अब समापन चरण में है और अधिकांश लंबित मुद्दे हल हो चुके हैं।
प्रगति फोरम एक महत्वपूर्ण सत्य पर जोर देता है: सार्वजनिक मूल्य या पब्लिक वेल्यू केवल योजनाओं की घोषणा करने से नहीं, बल्कि मंजूर किए गए निवेश के नतीजों में परिणत होने से उत्पन्न होता है। अटकी हुई परियोजनाएँ केवल नीतियों को दोबारा निरुपित किए जाने के कारण ही आगे नहीं बढ़ी, बल्कि कार्यान्वयन के मार्ग को आसान बनाने और जवाबदेही लागू करने के कारण आगे बढ़ीं। प्रगति का सहकारी संघवाद में योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मुख्य सचिवों और केंद्रीय सचिवों को एक ही रीयल-टाइम प्लेटफ़ॉर्म पर लाया जाना बंटी हुई जिम्मेदारी के स्थान पर परिणामों की साझा जिम्मेदारी स्थापित करता है।
प्रगति @50 इस बात का सबूत है कि शासन के नतीजे संस्था की संरचना पर निर्भर करते हैं। साइलो समाप्त करके, कार्यान्वयन का व्यापक दृष्टिकोण बहाल करके और कार्य समाप्त करने को प्राथमिकता देकर, प्रगति यह दर्शाता है कि असरदार शासन का आशय केवल कार्यभार बढ़ाना नहीं, बल्कि पहले से स्वीकृत कार्य को तेज़ी, गुणवत्ता और तालमेल के साथ पूरा करना है। समयबद्ध कार्यान्वयन सेवाओं तक त्वरित पहुँच कायम करता है, अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करता है, क्षेत्रीय असमानताओं को घटाता है और सरकार की शासन करने की क्षमता में जनता का विश्वास मजबूत करता है।
प्रगति केवल नेतृत्व-प्रधान डिलिवरी का रिकॉर्ड ही नहीं, बल्कि जटिल शासन को संचालित करने की रूपरेखा भी है। वैश्विक स्तर पर इसे मिल रही तवज्जो और प्रशंसा इसी बात का प्रमाण है।
(लेखक पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के पूर्व सचिव हैं)














