कनाडा के प्रधानमंत्री ने अपने देश के नागरिकों से स्वदेशी उत्पादों को अपनाने की अपील की है। ट्रंप प्रशासन द्वारा कनाडाई उत्पादों पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने की धमकी को देखते हुए ये अपील की गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि वह चीन के साथ व्यापार समझौता करता है तो वह कनाड़ा पर सौ फीसदी टैरिफ लगाएंगे। ट्रंप की इस चेतावनी के बाद एक वीडियो संदेश में कनाडा के प्रधानमंत्री कार्नी ने देशवासियों से स्वदेशी उत्पाद अपनाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि ‘कनाडा की अर्थव्यवस्था पर बाहरी दबाव है। ऐसे में कनाडा के लोगों के पास यही रास्ता है कि वो ही सामान खरीदें, जो कनाडा में बने हों। दूसरे देश क्या करते हैं, हम उसे नियंत्रित नहीं कर सकते। जो हमारे नियंत्रण में है उसपर फोकस करें। हम ही कनाडा के सबसे अच्छे ग्राहक हैं और हमें कनाडा में बने उत्पाद खरीदने चाहिए ताकि देश को मजबूत बनाया जा सके। अमेरिका और कनाडा दोनों देशों के बीच ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद तल्खी तब और बढ़ गई जब ट्रंप ने कई बार कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात कही, हालांकि पिछले साल कार्नी ने व्हाइट हाउस में ट्रंप से मुलाकात की थी। इस मुलाकात के दौरान उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि कनाडा बिकाऊ नहीं है।

आज जो हालात कनाडा के साथ हैं, वही दुनिया के कई अन्य देशों के साथ हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप कभी भारत तो धमकी देते हैं तो कभी चीन को। ग्रीनलैंड का समर्थन करने वाले देशों को भी इस तरह की उनकी हाल में धमकी आई है। इस तरह की धमकी एक व्यापक वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है। बड़ी शक्तियों छोटी शक्ति और देशों को दबाकर रखना चाहती हैं। वे छोटे और सम्प्रभू देशों को अपना गुलाम बनाकर रखना पसंद करती है। अपने पर निर्भर बनाए रखना चाहती है। इस तरह के आसन्न खतरे को भारत ने पहले ही भांप लिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काफी समय से स्वदेशी अपनाने पर वैसे  ही नही जोर  दे रहे। भारत में स्वदेशी का विचार कोई नया नहीं है। यह हमारी राष्ट्रीय चेतना का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विचार को आत्मनिर्भर भारत अभियान के माध्यम से नया आयाम दिया है। वोकल फॉर लोकल का नारा देते हुए उन्होंने देशवासियों से भारतीय उत्पादों को अपनाने और उन्हें वैश्विक बनाने का आह्वान किया है। यह दृष्टिकोण केवल आर्थिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय गौरव और आत्मसम्मान से भी जुड़ा हुआ है। जब हम अपने देश में बने उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं, तो हम न केवल अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा करते हैं। दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता कम होगी। उनका हम पर दबाव कम होगा।

स्वदेशी की अवधारणा को समझने के लिए हमें महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन को याद करना होगा। गांधीजी ने स्वदेशी को केवल आर्थिक रणनीति के रूप में नहीं देखा था, बल्कि इसे स्वराज और आत्मनिर्भरता के व्यापक दर्शन का हिस्सा माना था। उनका मानना था कि जब तक हम आर्थिक रूप से परतंत्र रहेंगे, तब तक वास्तविक स्वतंत्रता संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और चरखे से बने खादी को अपनाने पर जोर दिया। गांधीजी के लिए चरखा केवल कपड़ा बनाने का साधन नहीं था, बल्कि यह आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक था।

दरअसल अंग्रेजों के शासन से पहले जरूरत का सारा सामान हमारे यहां गांव–गांव और आसपास में पैदा होता हैं। जरूरत का काफी सामान हम अपने घर तैयार कर लेते थे। अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को बड़े−बड़े उद्योग लगाकर खत्म कर दिया।

महात्मा गांधी ने स्वदेशी का महत्व समझा। उनका स्वदेशी आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हथियार बना। उन्होंने लोगों को समझाया कि जब हम विदेशी वस्तुओं का उपयोग करते हैं, तो हम न केवल अपने देश की संपत्ति को बाहर भेज रहे हैं, बल्कि अपने कारीगरों और श्रमिकों को भी बेरोजगार कर रहे हैं। उनका मानना था कि प्रत्येक भारतीय को अपने गांव और अपने देश में बनी वस्तुओं को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह विचार इतना प्रभावशाली था कि लाखों भारतीयों ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई और खादी को अपनाया। यह आंदोलन केवल आर्थिक नहीं था, बल्कि इसने राष्ट्रीय चेतना को जगाने और लोगों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आज की वैश्वीकृत दुनिया में स्वदेशी की अवधारणा नए अर्थ और महत्व प्राप्त कर रही है। कनाडा पर ट्रंप की टैरिफ धमकी यह दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार कितना अनिश्चित और राजनीतिक रूप से प्रभावित हो सकता है। जब कोई देश किसी दूसरे देश पर आर्थिक दबाव बनाना चाहता है, तो व्यापार शुल्क एक प्रमुख हथियार बन जाता है। ऐसी स्थिति में जो देश अपनी घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूत रखते हैं, वे बेहतर तरीके से इन चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। यही कारण है कि कनाडा के प्रधानमंत्री ने अपने नागरिकों से देश में बने उत्पादों को खरीदने का आग्रह किया है।

भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल इसी दिशा में एक व्यापक और दूरदर्शी कदम है। इस अभियान का उद्देश्य केवल आयात को कम करना नहीं है, बल्कि भारत को विनिर्माण, नवाचार और तकनीकी विकास का एक वैश्विक केंद्र बनाना है। प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार कहा है कि आत्मनिर्भरता का अर्थ आत्मकेंद्रित होना नहीं है, बल्कि यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक विश्वसनीय और मजबूत भागीदार बनना है। जब भारतीय उत्पाद गुणवत्ता और नवाचार में उत्कृष्ट होंगे, तो वे न केवल घरेलू बाजार में सफल होंगे बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी जगह बनाएंगे।

स्वदेशी को अपनाने का अर्थ यह नहीं है कि हम अंतरराष्ट्रीय व्यापार या वैश्वीकरण के खिलाफ हैं। बल्कि यह एक संतुलित दृष्टिकोण है जो घरेलू उद्योगों को मजबूत करते हुए वैश्विक बाजार में भागीदारी को भी बढ़ावा देता है। जब हमारे उद्योग मजबूत होंगे, तो हम बेहतर शर्तों पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भाग ले सकेंगे। यही कारण है कि भारत मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, और डिजिटल इंडिया जैसी पहलों के माध्यम से घरेलू उत्पादन और नवाचार को बढ़ावा दे रहा है।

स्वदेशी उत्पादों को अपनाने से रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। जब हम स्थानीय उत्पाद खरीदते हैं, तो हम अपने देश के कारीगरों, किसानों, छोटे व्यवसायियों और उद्यमियों की आजीविका का समर्थन करते हैं। भारत जैसे देश में जहां बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती है, स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना लाखों लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है। छोटे और मध्यम उद्योग जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, तभी फल-फूल सकते हैं जब उन्हें पर्याप्त घरेलू बाजार मिले।

पर्यावरण की दृष्टि से भी स्वदेशी उत्पादों का महत्व बढ़ जाता है। जब हम स्थानीय स्तर पर उत्पादित वस्तुओं का उपयोग करते हैं, तो परिवहन से होने वाला कार्बन उत्सर्जन कम होता है। साथ ही, स्थानीय उत्पादन अक्सर पारंपरिक और टिकाऊ तरीकों का उपयोग करता है जो पर्यावरण के अनुकूल होते हैं। गांधीजी ने भी कहा था कि पृथ्वी के पास हर व्यक्ति की जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन किसी के लालच को पूरा करने के लिए नहीं। स्वदेशी की अवधारणा इसी सिद्धांत पर आधारित है।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जहां व्यापार युद्ध और आर्थिक राष्ट्रवाद बढ़ रहा है, स्वदेशी की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। कोविड-19 महामारी ने भी हमें सिखाया कि अत्यधिक आयात निर्भरता कितनी खतरनाक हो सकती है। जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं टूट गईं, तो कई देशों को आवश्यक वस्तुओं की कमी का सामना करना पड़ा। भारत ने इस संकट से सीख लेते हुए दवाओं, चिकित्सा उपकरणों, और अन्य आवश्यक वस्तुओं के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया है।कभी  हम न मास्क बनाते थे। न सेनेंटाइजर, न अन्य उपकरण।  करोनाकाल में हमने कोशिश की और आत्म निर्भेर ही नही हुए। देश की बनी करोना  वैक्सीन कई देशो को दी।

स्वदेशी को सफल बनाने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। जब हम खरीदारी करते हैं तो हमें यह देखना चाहिए कि वह उत्पाद कहां बना है और किसके द्वारा बनाया गया है। छोटे निर्णय जैसे स्थानीय बाजार से खरीदारी करना, हस्तशिल्प को बढ़ावा देना, और भारतीय ब्रांड्स को चुनना, सामूहिक रूप से बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं। यह केवल आर्थिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी का प्रश्न है। – – अशोक मधुप

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