भीष्म द्वादशी का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है. पहला भीष्म और दूसरा द्वादशी ति​थि. भीष्म महाभारत के सबसे मजबूत पात्रों में से एक हैं, जो हस्तिनापुर के राजा शांतनु और गंगा के पुत्र थे. द्वादशी तिथि, पंचांग के अनुसार कृष्ण और शुक्ल पक्ष की 12वीं तिथि को कहा जाता है. कुछ जगहों पर इसे भीष्म एकादशी भी कहते हैं. भीष्म द्वादशी का संंबंध पितामह भीष्म से है. इस दिन उपवास और पूजा करते हैं. इससे बीमारियां दूर होती हैं, आरोग्य मिलता है और पाप मिटते हैं. विष्णु कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है. पितरों की ​तृप्ति के लिए उपाय करते हैं. भीष्म द्वादशी माघ माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाती है. आइए जानते हैं कि भीष्म द्वादशी कब है, आज या कल? भीष्म द्वादशी का मुहूर्त और महत्व क्या है?

भीष्म द्वादशी की तारीख

दृक पंचांग के अनुसार इस साल माघ शुक्ल द्वादशी तिथि आज 29 जनवरी को दोपहर 01:55 पी एम से प्रारंभ हो रही है और इसका समापन 30 जनवरी शुक्रवार को सुबह 11 बजकर 9 मिनट पर होगा. ऐसे में भीष्म द्वादशी आज 29 जनवरी को है. भीष्म द्वादशी को तिल द्वादशी भी कहते हैं.

भीष्म द्वादशी मुहूर्त और शुभ योग

भीष्म द्वादशी पर शुभ समय: दोपहर 12:13 पी एम से दोपहर 12:56 पी एम तक
पितरों के लिए श्राद्ध कर्म समय: 11:3. एएम से दोपहर 02:30 पीएम तक
इन्द्र योग: प्रात:काल से लेकर रात 08:27 पी एम तक
मृगशिरा नक्षत्र: सुबह 07:31 ए एम से कल 05:29 ए एम तक

भीष्म द्वादशी का महत्व

महाभारत के युद्ध में पितामह भीष्म ने माघ शुक्ल अष्टमी को अपने प्राण त्याग थे, जिसे भीष्म अष्टमी कहते है. उनके निधन के बाद पांडवों ने द्वादशी तिथि को पूजा, तर्पण, श्राद्ध कर्म आदि किए गए. इस वजह से यह तिथि भीष्म द्वादशी के नाम से जानी जाती है. हर साल भीष्म द्वादशी को तर्पण, पूजा आदि करते हैं. इससे पितर तृप्त होते हैं और आशीर्वाद देते हैं. भीष्म द्वादशी पर तिल का उपयोग करते हैं. नहाने, उबटन, भोजन, दान आदि में तिल का उपयोग करते हैं. जो लोग भीष्म द्वादशी पर व्रत और तिल का दान करते हैं, उनको 100 वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं. पितृ दोष से मुक्ति के उपाय करते हैं, जिससे परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है.

(अस्वीकरण;यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है.)

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