डायबिटीज एक गंभीर बीमारी है, जो तेजी से फैल रही है. दुनियाभर में करोड़ों की संख्या में लोग डायबिटीज से जूझ रहे हैं. अधिकतर लोग टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज के बारे में जानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी टाइप 1.5 डायबिटीज के बारे में सुना है? आप सोच रहे होंगे कि यह कौन सी डायबिटीज है, जिसका नाम बेहद कम सुनने को मिलता है. डॉक्टर्स की मानें तो टाइप 1.5 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून डिजीज है. इसमें टाइप 1 और टाइप 2 दोनों के लक्षण नजर आते हैं और इसे सही डायग्नोज करना मुश्किल होता है. चलिए इस अनोखी डायबिटीज के लक्षण, कारण और ट्रीटमेंट के बारे में जान लेते हैं.
क्लीवलैंड क्लीनिक की रिपोर्ट के मुताबिक टाइप 1.5 डायबिटीज को मेडिकल की भाषा में लेटेंट ऑटोइम्यून डायबिटीज इन अडल्ट्स (LADA) कहा जाता है. इसके लक्षण आमतौर पर 30 से 50 साल के बीच शुरू होते हैं. शुरुआत में मरीजों को प्यास ज्यादा लगना, बार-बार पेशाब आना, अचानक वजन कम होना, थकान और धुंधला दिखना जैसे लक्षण नजर आते हैं. ये लक्षण टाइप 2 डायबिटीज जैसे होते हैं, इसलिए कई बार डॉक्टर भी इसे शुरुआत में टाइप 2 समझ लेते हैं और इलाज कर देते हैं.
LADA एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर ऐसे एंटीबॉडी बना लेता है, जो पैंक्रियास की इंसुलिन बनाने वाली बीटा सेल्स को धीरे-धीरे नष्ट कर देती हैं. फर्क बस इतना है कि टाइप 1 में यह प्रक्रिया बहुत तेज होती है और बचपन या किशोरावस्था में दिख जाती है, जबकि टाइप 1.5 में यह प्रक्रिया धीमी होती है. इस बीमारी की शुरुआत में शरीर थोड़ा बहुत इंसुलिन बनाता रहता है, इसलिए कई महीनों या सालों तक इंसुलिन इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती है. बाद में शुगर लेवल इंसुलिन से कंट्रोल होता है.
हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो टाइप 1.5 डायबिटीज को अधिकतर मामलों में गलत डायग्नोज कर लिया जाता है. कभी डॉक्टर इसे टाइप 2 डायबिटीज मान लेते हैं, तो कभी टाइप 1 डायबिटीज समझ लेते हैं. जब डाइट, एक्सरसाइज और मेटफॉर्मिन जैसी दवाओं से शुगर कंट्रोल नहीं होती है, तब डॉक्टर को शक होता है. इस कंडीशन में GAD Antibody Test किया जाता है, जिससे पता चलता है कि शरीर में ऑटोइम्यून एंटीबॉडी मौजूद हैं या नहीं. साथ ही C-Peptide टेस्ट से यह जांचा जाता है कि पैंक्रियास कितना इंसुलिन बना रहा है. इसके बाद यह साफ हो जाता है कि टाइप 1.5 डायबिटीज है.
इलाज की बात करें तो LADA का ट्रीटमेंट थोड़ा चुनौतीपूर्ण होता है. शुरुआत में कुछ मरीजों को ओरल दवाओं से फायदा मिलता है, लेकिन समय के साथ-साथ पैंक्रियास की इंसुलिन बनाने की क्षमता खत्म होने लगती है. आखिरकार इंसुलिन लेना जरूरी हो जाता है. कई एक्सपर्ट मानते हैं कि LADA में जल्दी इंसुलिन शुरू करने से पैंक्रियास की बची-खुची कोशिकाओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. ऐसे में अगर टाइप 1.5 का सही इलाज न हो, तो यह कंडीशन बिगड़ सकती है.
अब सवाल है कि क्या टाइप 1.5 डायबिटीज भी खतरनाक होती है? हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो अगर समय पर सही इलाज न मिले, तो टाइप 1.5 डायबिटीज से किडनी डैमेज, आंखों की समस्या, नर्व डैमेज और डायबिटिक कीटोएसिडोसिस जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए अगर कोई व्यक्ति दुबला-पतला है, कम उम्र में डायबिटीज हो गई है और दवाओं से शुगर कंट्रोल नहीं हो रही है, तो उसे LADA की जांच जरूर करानी चाहिए. सही पहचान और समय पर इंसुलिन थेरेपी से इस बीमारी को अच्छी तरह कंट्रोल किया जा सकता है.














