देश के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अविस्मरणीय योगदान से पूरी दुनिया परिचित है। वे जीवन पर्यन्त देशवासियों के लिए आदर्श नायक बने रहे। अहिंसा की राह पर चलते हुए देश को अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाने वाले गांधी जी ने पूरी दुनिया को अपने विचारों से प्रभावित किया था। उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर कई किताबें भी लिखी, जो हमें आज भी जीवन की नई राह दिखाती हैं क्योंकि उनके ये अनुभव, उनका अहिंसा का सिद्धांत, उनके विचार आज भी उतने ही सार्थक हैं, जितने उस दौर में थे। उनके जीवन के तीन महत्वपूर्ण सूत्र थे, जिनमें पहला था सामाजिक गंदगी दूर करने के लिए झाडू का सहारा। दूसरा, जाति-पाति और धर्म के बंधन से ऊपर उठकर सामूहिक प्रार्थना को बल देना। तीसरा, चरखा, जो आगे चलकर आत्मनिर्भरता और एकता का प्रतीक माना गया। गांधी जी अक्सर कहा करते थे कि प्रसन्नता ही एकमात्र ऐसा इत्र है जिसे आप अगर दूसरों पर डालते हैं तो उसकी कुछ बूंदें आप पर भी गिरती हैं। वे कहते थे कि किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों से नहीं बल्कि उसके चरित्र से होती है। दूसरों की तरक्की में बाधा बनने वालों और नकारात्मक सोच वालों में सकारात्मकता का बीजारोपण करने के उद्देश्य से ही उन्होंने कहा था कि आंख के बदले आंख पूरी दुनिया को ही अंधा बना देगी। लोगों को समय की महत्ता और समय के सही सदुपयोग के लिए प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा था कि जो व्यक्ति समय को बचाते हैं, वे धन को भी बचाते हैं और इस प्रकार बचाया गया धन भी कमाए गए धन के समान ही महत्वपूर्ण है। वह कहते थे कि आप जो कुछ भी कार्य करते हैं, वह भले ही कम महत्वपूर्ण हो सकता है किन्तु सबसे महत्वपूर्ण यही है कि आप कुछ करें।
लोगों को जीवन में हर दिन, हर पल कुछ न कुछ नया सीखने के लिए प्रेरित करते हुए गांधी जी कहा करते थे कि आप ऐसे जिएं, जैसे आपको कल मरना है लेकिन सीखें ऐसे कि आपको हमेशा जीवित रहना है। उनकी बातों का देशवासियों के दिलोदिमाग पर गहरा असर होता था। महात्मा गांधी के विचारों में ऐसी शक्ति थी कि विरोधी भी उनकी तारीफ किए बगैर नहीं रह सकते थे। जिस समय द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, उस समय हमारे देश के अधिकांश नेता इस बात के पक्षधर थे कि अब देश को अंग्रेजों से आजाद कराने का बिल्कुल सही मौका है और इस स्वर्णिम अवसर का लाभ उठाते हुए उन्हें इस समय देश में बड़े पैमाने पर आंदोलन छेड़ देना चाहिए। दरअसल उन सभी का मानना था कि अंग्रेज सरकार द्वितीय विश्व युद्ध में व्यस्त रहने के कारण भारतवासियों के इस आंदोलन का सामना नहीं कर पाएगी और आखिरकार उसे उनके इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन के समक्ष सिर झुकाना ही पड़ेगा और इस प्रकार अंग्रेजों को भारत को स्वतंत्र करने पर बड़ी आसानी से विवश किया जा सकेगा। जब यही बात गांधी जी के सामने उठाई गई तो उन्होंने अंग्रेजों की मजबूरी से फायदा उठाने से साफ इन्कार कर दिया। हालांकि उस दौरान अंग्रेजों के खिलाफ गांधी जी ने आन्दोलन तो जरूर चलाया, लेकिन उनका वह आन्दोलन सामूहिक न होकर व्यक्तिगत स्तर पर किया गया आन्दोलन ही था। गांधी जी की शादी पोरबंदर के एक व्यापारी परिवार की बेटी कस्तूरबा के साथ हुई थी। शादी के कुछ समय बाद वे उच्च शिक्षा के लिए विदेश चले गए थे, जहां से वकालत की पढ़ाई करके स्वदेश वापस आने के बाद उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। उनका संघर्ष काफी लंबा चला, बहरहाल, पुण्यतिथि पर उन्हें नमन।














