आज बुधवार, 29 अप्रैल, को पश्चिम बंगाल में दूसरे एवं अंतिम चरण का मतदान है। इसी के साथ चुनावी मौसम समाप्त हो जाएगा। सभी राज्यों के जनादेश 4 मई को सार्वजनिक होंगे, तो साफ होगा कि किसकी सरकार बनी, किसकी सत्ता बरकरार रही और किसका सफाया हो गया। बंगाल में प्रचार खत्म होने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल और बंगालियों के नाम एक चि_ी और ऑडियो संदेश जारी किए। यह भी अपने वोट बैंक को लामबंद करने और मतदान के प्रति उत्साहित करने का एक चुनावी आह्वान है। प्रधानमंत्री भीषण गर्मी में भी जनसभाएं करने और रोड शो में शामिल होने से बिल्कुल भी नहीं थके, क्योंकि ये जन-सैलाब, जमावड़े उन्हें तीर्थ-यात्रा का एहसास कराते रहे हैं। प्रधानमंत्री मां दुर्गा, मां काली का नाम लिए बिन नहीं रह सकते और मंदिरों में जाकर पूजा-पाठ भी करते रहे हैं। हिंदुत्व के भाव को जिंदा और प्रासंगिक रखने और उसके आस्थावानों को भाजपा के साथ जोड़े रखने के लिए यह अनिवार्य और आध्यात्मिक कर्म है। ममता बनर्जी की भी हिंदुओं में अच्छी-खासी सेंधमारी है। यह तथ्य प्रधानमंत्री और भाजपा के चुनावी रणनीतिकारों को व्याकुल करता रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने चि_ी के जरिए बंगालियों को आश्वस्त किया है कि वह 4 मई को भी बंगाल आएंगे और जीत के जश्न में, सभी बंगालियों के साथ, शिरकत करेंगे। यदि भाजपा को जनादेश नहीं मिला, क्या तब भी प्रधानमंत्री जीत के जश्न में शामिल होने बंगाल आएंगे? प्रधानमंत्री ने यह संकल्प भी दोहराया है कि उन्हें अपनी जिम्मेदारियां याद हैं।

यदि भाजपा की सरकार बनी, तो तुरंत उन पर काम शुरू कर दिया जाएगा। बहरहाल यह चुनाव प्रचार और वोट मांगने का नायाब तरीका है। जीत के दावे प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दोनों ही कर रहे हैं, लेकिन बंगाल के चुनाव इस बार उग्र, आक्रामक और धुर सांप्रदायिक रहे। उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘गौ के कटने’ और ‘हिंदुओं के बंटने’ की बार-बार हुंकार भरी कि ऐसा नहीं होने दिया जाएगा। क्या इन नारों पर जनादेश मांगना चाहिए और क्या समाज के लिए ये नारे ही पर्याप्त हैं? चुनाव मोदी की गारंटियां बनाम दीदी के एजेंडे, सनातन बनाम मुसलमान, घुसपैठिए बनाम मतुआ शरणार्थी, निर्मम सरकार बनाम बंगाल की बेटी की सरकार, ईडी-सीबीआई के छापे बनाम बंगाली अस्मिता बनाम बाहरी, माछ-भात बनाम मांसाहार पर पाबंदी, नकदी बनाम मुफ्तखोरी आदि जुमलों के इर्द-गिर्द सिमटा रहा। जो मुद्दा बंगाल की भावी पीढ़ी, मानव-विकास और विकृत संतानों से जुड़ा है, उस पर चिंता न तो प्रधानमंत्री मोदी ने व्यक्त की और न ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सरोकार जताए। सारांश तौर पर यह कुपोषण का मुद्दा है, जो कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बना और न ही चुनाव-प्रचार के दौरान उसका जिक्र हुआ, क्योंकि इस हम्माम में सभी सरकारें नंगी हैं। बंगाल के लिए कुपोषण एक गंभीर स्वास्थ्य और सामाजिक चुनौती है। राज्य के ग्रामीण और झुग्गी झोंपड़ी वाले इलाकों में, खासकर बच्चों-किशोरों में, बौनापन, दुबलापन, खून की कमी के उच्च और गंभीर मामले सामने आते रहे हैं। बंगाल के 54 फीसदी तक किशोर कुपोषण से प्रभावित हैं और 49 फीसदी किशोर बेहद दुबलेपन से ग्रस्त हैं। जिन बच्चों की उम्र 5-10 साल के बीच है, उनमें बौनापन 25.48 फीसदी, कम वजन 33 फीसदी और दुबलापन 26.88 फीसदी है। दार्जिलिंग इलाके में कुपोषण 11.3 फीसदी से बढ़ कर करीब 21 फीसदी हो गया है।

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