चेन्नै: तमिलनाडु में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं और यहां की राजनीति का एक अहम मुद्दा रहा है हिंदी विरोध। चुनाव से पहले फिर इसी पर बात होने लगी है। 25 जनवरी को ‘भाषा शहीद दिवस’ के मौके पर DMK नेताओं ने हिंदी को लेकर अपना विरोध तेज किया। मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष एम.के. स्टालिन से लेकर उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने कहा कि हिंदी थोपने की केंद्र सरकार की कोशिश का पूरा तमिलनाडु विरोध करेगा। एम.के.स्टालिन ने कहा कि पहले भी हिंदी के लिए कोई जगह नहीं थी, न आज है और न ही कभी होगी। वहीं, उपमुख्यमंत्री उदयनिधि ने कहा कि हरियाणा, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कभी बोली जाने वाली कई मातृभाषाएं हिंदी लागू होने के बाद धीरे-धीरे खत्म होती चली गईं। दरअसल, हिंदी को लेकर राज्य सरकार और केंद्र के बीच लंबे वक्त से खींचतान चल रही है। तमिलनाडु की DMK सरकार BJP पर हिंदी थोपने का आरोप लगाती रही है। केंद्र की नई शिक्षा नीति के तहत जब थ्री लैंग्वेज फॉर्म्युला लागू करना था, तब भी तमिलनाडु ने टू लैंग्वेज फॉर्म्युले के साथ राज्य शिक्षा नीति ही जारी रखी।
AIADMK है निशाना
चुनाव से पहले भाषा का मसला गरम होना इसलिए भी अहम दिख रहा है, क्योंकि इसके बहाने DMK को AIADMK को घेरने का मौका मिलेगा, जो BJP के साथ गठबंधन में है। वैसे जब इस गठबंधन का ऐलान हुआ, तब अमित शाह ने कोशिश की थी कि भाषा के मुद्दे पर सहयोगी AIADMK को दिक्कत न हो। तब अमित शाह ने कहा था कि BJP तमिलनाडु और तमिल भाषा का बहुत सम्मान करती है। वैसे देखा जाए तो कई मुद्दों पर BJP और AIADMK का स्टैंड व विचारधारा भिन्न हैं। लेकिन, BJP नेता कह चुके हैं कि पार्टी की गठबंधन नीति वैचारिक साझेदारियों से अलग है। इस गठबंधन से दोनों पार्टियां अपना-अपना फायदा भी देख रही हैं।
हिंदी पर तेज हो जाती है राजनीति
जब-जब भी हिंदी की बात होती है, तो तमिलनाडु में राजनीति तेज हो जाती है। केंद्र सरकार की नई एजुकेशन पॉलिसी का जब ड्राफ्ट सामने आया था, तब भी हिंदी थोपने का आरोप लगाते हुए सबसे ज्यादा विरोध तमिलनाडु में हुआ। राज्य में हिंदी की अनिवार्यता को सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दे से उठाकर राजनीतिक मसला बनाने की शुरुआत पहले विरोध आंदोलन से ही हो गई थी। 60 के दशक में हुए आंदोलन के पीछे भी वजह राजनीतिक थी। तब हिंदी विरोध के रूप में वहां के क्षेत्रीय नेताओं को एक ऐसा सशक्त मुद्दा मिला, जिसने तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीतिक दलों की नींव रखी।
द्रविड़ अस्मिता का सवाल
1965 में हुए इस आंदोलन ने द्रविड़ अस्मिता का सवाल उठाया और दो साल बाद ही DMK सत्ता में आ गई। वहां तब से ही लगातार द्रविड़ अस्मिता और भाषा प्रमुख मुद्दा रहे हैं। BJP जब भी तमिलनाडु और दूसरे दक्षिणी राज्यों में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश करती है, तो हिंदी के नाम पर उसे घेरा जाता रहा है। DMK सहित दूसरी पार्टियां हिंदी विरोध और द्रविड़ अस्मिता के नाम पर मैदान में उतर जाती है।BJP के नेता हालांकि कहते रहे हैं कि उनकी पार्टी भाषा या दक्षिण विरोधी नहीं है – हमारी विचारधारा सबको साथ लेकर चलने की है। लेकिन, दक्षिण के राज्यों में क्षेत्रीय दल BJP को उत्तर भारत की पार्टी के तौर पर प्रचारित कर निशाना साधते रहे हैं। इस वजह से माना जा रहा है कि चुनाव नजदीक आने के साथ हिंदी के खिलाफ और आवाज सुनाई पड़ेगी।














