बागेश्वर: हिंदू धर्म के महान चिरंजीवी ऋषियों में मार्कंडेय ऋषि का नाम श्रद्धा और विश्वास के साथ लिया जाता है. वे अनन्य शिव-भक्त थे और मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाले महापुरुषों में गिने जाते थे. उत्तराखंड के बागेश्वर से उनका गहरा पौराणिक और आध्यात्मिक संबंध माना जाता है, जिसकी स्मृतियाँ आज भी यहां की परंपराओं और मंदिरों में जीवित हैं.

कौन थे मार्कंडेय ऋषि

आचार्य कैलाश उपाध्याय ने लोकल 18 को बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मार्कडेय ऋषि भृगु वंश के महर्षि मृकंडु और उनकी पत्नी मानस्विनी के पुत्र थे. संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी. शिव ने उन्हें दो विकल्प दिए दीर्घायु लेकिन अल्पबुद्धि पुत्र, या अल्पायु किंतु अत्यंत तेजस्वी और ज्ञानी पुत्र. ऋषि दंपत्ति ने तेजस्वी पुत्र को चुना, जिनका नाम मार्कडेय रखा गया. किंतु इस वरदान के साथ यह भी निश्चित था कि उनकी आयु केवल 16 वर्ष होगी.

बागेश्वर से नाता और तपस्या का कारण

जब मार्कडेय ऋषि को अपनी अल्पायु का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने जीवन की रक्षा के लिए भगवान शिव की शरण ली. उन्होंने बागेश्वर में त्रिवेणी संगम के पावन तट पर घोर तपस्या की. यही भूमि तप, त्याग और साधना का केंद्र मानी जाती है. माना जाता है कि सरयू तट पर मार्कडेय ऋषि तपस्या कर रहे थे. इसी दौरान सरयू नदी को अयोध्या राम उत्सव के लिए जाना था, लेकिन ऋषि के तप के चलते वह आगे नहीं बढ़ पा रही थी, इसलिए नदी ने भगवान शिव से मदद मांगी कि उसे आगे जाने का रास्ता दिया जाए. तभी भगवान शिव ने बाघ और माता पार्वती ने गाय का रूप धारण कर ऋषि को तपस्या से उठाया. ऋषि को दर्शन दिए जिससे उनकी तपस्या पूरी हुई. साथ ही सरयू नदी को भी आगे जाने का रास्ता मिल गया.

 इतिहास का वह चमत्कार

मार्कंडेय ऋषि की कथा का सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग मृत्यु पर विजय का है. जब वे 16 वर्ष के हुए, तो मृत्यु के देवता यमराज उनके प्राण लेने आए. उस समय ऋषि शिवलिंग को आलिंगन कर ध्यानमग्न थे. यमराज का पाश शिवलिंग पर जा पड़ा, जिससे भगवान शिव क्रोधित होकर प्रकट हुए और यमराज को रोका. शिव ने अपने भक्त की रक्षा करते हुए मार्कंडेय को चिरंजीवी होने का वरदान दिया. इसी प्रसंग से महामृत्युंजय मंत्र का संबंध भी जोड़ा जाता है, जिसे जीवन-रक्षा और आरोग्य का मंत्र माना गया.

आज भी जीवंत आस्था

मार्कंडेय ऋषि की कथा का उल्लेख मार्कंडेय पुराण सहित कई ग्रंथों में मिलता है. आज भी बागेश्वर के त्रिवेणी संगम तट पर स्थित मार्कंडेय मंदिर में श्रद्धालु अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति और दीर्घायु की कामना लेकर पहुंचते हैं. यह कथा न केवल पौराणिक इतिहास है, बल्कि बागेश्वर की धार्मिक पहचान और शिव-भक्ति की अमिट विरासत भी है.

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