तिरुवनंतपुरम के 25 वर्षीय एक तकनीशियन को मनचाही नौकरी मिली थी, जिससे उसे हर महीने 4 लाख रुपए की तनख्वाह और घर से काम करने की आजादी मिलती थी। काम में डूबे रहने के कारण खाना ही उसका एकमात्र तनाव कम करने का जरिया था। इसके साथ ही, उपकरणों पर लंबे समय तक बैठे रहने से उसका वजन बहुत बढ़ गया। जब उसका वजन 150 किलो हो गया और उसे मधुमेह और उच्च रक्तचाप हो गया, तो उसने शोध मधुमेह विशेषज्ञ डा. ज्योतिदेव केशवदेव से सलाह ली, जिनका मानना है कि मोटापा अब केवल जीवनशैली से जुड़ी समस्या नहीं, यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य ङ्क्षचता का विषय है। वह कहते हैं, ‘‘मोटापे को एक दीर्घकालिक बीमारी माना जाना चाहिए क्योंकि इसमें असामान्य जैविक प्रक्रियाएं शामिल होती हैं, यह उनका परिणाम है, यह स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है, इसके स्पष्ट नैदानिक मानदंड हैं और इसके लिए चिकित्सा उपचार और दीर्घकालिक प्रबंधन की आवश्यकता होती है।’’
इसी कारण उन्होंने और अन्य शीर्ष मधुमेह विशेषज्ञों ने एक श्वेत पत्र लिखा है, जिसमें भविष्यवाणी की गई है कि भारत में मोटापे की दर में काफी वृद्धि होगी। पत्र के अनुसार, 2050 तक 17.4 प्रतिशत महिलाएं और 12.1 प्रतिशत पुरुष मोटापे से ग्रस्त होंगे। महिलाओं में मोटापे की दर पुरुषों की तुलना में 10 प्रतिशत अधिक होने का अनुमान है। बचपन का मोटापा सबसे अधिक ङ्क्षचताजनक है क्योंकि बच्चों और किशोरों (5 से 19 वर्ष की आयु के बीच) में इसका प्रसार लड़कियों में 0.1 से बढ़कर 3.1 प्रतिशत और पुरुषों में 0.2 से बढ़कर 3.7 प्रतिशत हो गया है। 1990 से 2022 के बीच मोटापे से ग्रस्त लड़कों की कुल संख्या बढ़कर 12.5 मिलियन हो गई है। डा. ज्योतिदेव कहते हैं, ‘‘इसलिए, हम देश में बढ़ते मोटापे के दुष्चक्र के बारे में धारणा बदलने के लिए नीतिगत बदलाव चाहते हैं, ताकि इसे केवल एक जीवनशैली से जुड़ी समस्या की बजाय एक दीर्घकालिक बीमारी के रूप में देखा जा सके। इससे शरीर के वजन से जुड़े कलंक को भी दूर करने में मदद मिलेगी।’’ यह बहु-केंद्रीय अध्ययन दिल्ली स्थित एम्स, वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मैडीकल कॉलेज, गुरुग्राम स्थित फोॢटस मैमोरियल रिसर्च इंस्टीच्यूट और तिरुवनंतपुरम स्थित ज्योतिदेव मधुमेह अनुसंधान केंद्र द्वारा किया गया था।
मोटापा बीमारी क्यों : मोटापा केवल आनुवंशिकता से संबंधित नहीं, यह एक जटिल और बहुआयामी स्थिति है, जो चयापचय, तंत्रिकाजैविक और पर्यावरणीय कारकों से प्रभावित होती है। इसमें चयापचय संबंधी प्रक्रियाओं में गड़बड़ी शामिल है, विशेष रूप से भूख, तृप्ति और ऊर्जा संतुलन से संबंधित संकेत संबंधी समस्याएं। बढ़ी हुई वसा कोशिकाएं सूजन को जन्म देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप इंसुलिन प्रतिरोध, हृदय रोग, कोलैस्ट्रॉल और वसायुक्त यकृत रोग जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। बहुत से लोग शायद यह नहीं जानते होंगे कि मोटापे से संबंधित कैंसर बढ़ रहे हैं। अग्नाशय कैंसर में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, साथ ही मूत्राशय कैंसर में भी, जिनकी घटना मोटापे से संबंधित चयापचय परिवर्तनों और यकृत में वसा के संचय से जुड़ी है। कोलोरेक्टल कैंसर के मामले भी बढ़ रहे हैं। महिलाओं में, शरीर में वसा के कारण बढ़े हुए एस्ट्रोजन स्तर स्तन और गर्भाशय के कैंसर को बढ़ावा दे रहे हैं।
मोटापे के इस दुष्चक्र का कारण क्या है? यह भावनात्मक रूप से खाना खाने की आदत ही होगी या कुछ और? इसे हम सुखदायक भूख कहते हैं। यह शारीरिक भूख न होने पर भी स्वादिष्ट भोजन खाने की एक आनंद-आधारित इच्छा है, जो भोजन से संबंधित संकेतों, जैसे कि दृष्टि, गंध और उपलब्धता के संपर्क में आने पर उत्पन्न होती है। विभिन्न क्रॉस-सैक्शनल अध्ययनों में, भावनात्मक भोजन को अवसाद और मोटापे से जोड़ा गया है। रेस्तरां की बढ़ती संख्या, फूड एप्स के माध्यम से आसान उपलब्धता और सामाजिक समारोहों के कारण, भावनात्मक भोजन आनंद प्राप्त करने का सबसे आसान तरीका बन गया है। जो कोई भी भावनात्मक रूप से खाने पर निर्भर है, उसका एक दशक में मोटापे का शिकार होना तय है। याद रखें, मोटापे से जुड़े स्वास्थ्य खर्च बहुत अधिक हैं, चाहे वह घुटने के प्रतिस्थापन, हृदय रोग या कैंसर के उपचार के लिए हो। मोटापे से निपटना अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि 2060 तक आॢथक बोझ 17 गुना बढऩे का अनुमान है।
क्या नीतिगत बदलाव मोटापे को रोक सकते हैं : वर्तमान में, मोटापे के प्रबंधन के लिए कोई एकीकृत संहिता नहीं है। सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में मोटापा क्लीनिक होने चाहिएं। आहार और व्यवहार परिवर्तन के लिए स्कूलों में हस्तक्षेप कार्यक्रम होने चाहिएं। भारतीयों में ज्यादातर पेट की चर्बी या एब्डोमिनल मोटापा होता है। उनका शरीर का वजन सामान्य हो सकता है, मांसपेशियों का द्रव्यमान कम हो सकता है लेकिन उनका पेट बाहर निकला हुआ होता है, जो सभी गैर-संक्रामक रोगों का एक सामान्य जोखिम कारक है। भारतीयों को अपने आहार और कार्बोहाइड्रेट पर अपनी निर्भरता पर पुर्नविचार करने की आवश्यकता है। उन्हें किसी व्यायाम की आवश्यकता नहीं, केवल शक्ति प्रशिक्षण की आवश्यकता है। कार्य संस्कृति में हर 30 मिनट बैठने के बाद ब्रेक लेना शामिल होना चाहिए। उदाहरण के लिए, महिलाओं को रजोनिवृत्ति से पहले के संक्रमणकालीन दशक (पेरिमेनोपॉज) में हार्मोन-प्रेरित वजन बढऩे से बचने के लिए अपने आहार और व्यायाम पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता है। इन सभी कारणों से चिकित्सा प्रबंधन को मानकीकृत करने की आवश्यकता है, जिसमें स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को प्रशिक्षण देना और संभवत: बीमा के माध्यम से मोटापे के उपचार को कवर करना शामिल है।-रिंकू घोष














