हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, लिहाजा अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध-प्रदर्शन हमारे संवैधानिक और मौलिक अधिकार हैं। हम प्रधानमंत्री, मंत्रियों, सरकार और नीतियों की आलोचना और विरोध कर सकते हैं, लेकिन ये अधिकार निरंकुश नहीं हैं। उनकी अपनी सीमा, समय और मर्यादाएं तय हैं। जरा संविधान के संबद्ध अध्याय को पढ़ लीजिए। ये अधिकार देश की जन-व्यवस्था को बिगाडऩे वाले नहीं होने चाहिए। किसी के घर में घुसकर आंदोलन खड़े नहीं किए जा सकते। युवा कांग्रेस के ‘बेकमीज’ कार्यकर्ताओं ने एआई शिखर सम्मेलन में घुसकर जो उत्पात मचाया था, उसे देश ने भी खारिज किया और कांग्रेस के सहयोगी दलों ने भी मुखालफत की, नाराजगी जताई, क्योंकि यह देश के मान-सम्मान का सवाल था। प्रधानमंत्री मोदी और अमरीका के साथ व्यापार समझौते का विरोध करना था, तो पूरा देश खाली पड़ा है। राजधानी दिल्ली में ही आंदोलन-स्थल चिह्नित हैं। कांग्रेस के युवाओं ने एक वैश्विक मंच को तितर-बितर करने की कोशिश की थी। दिल्ली पुलिस ने कुछ गैर-जमानती, गंभीर धाराओं में केस दर्ज किए हैं और 8 उपद्रवी उसकी रिमांड पर हैं। कांग्रेस इन दंगाइयों को ‘बब्बर शेर’ करार दे रही है और ऐसे प्रदर्शनों के लिए उकसा रही है। केस में ‘आपराधिक साजिश’, देश की अखंडता के खिलाफ, दंगे में शामिल होना और भडक़ाने, लोकसेवक पर हमला आदि की धाराएं लगाई गई हैं। युवा कांग्रेस के अध्यक्ष उदयभानु चिब को भी रिमांड पर लिया गया है। अब इसे व्यापार समझौता बनाम किसान बनाम प्रधानमंत्री का मुद्दा बना दिया गया है। ‘किसान महाचौपाल’ की पहली रैली के लिए भोपाल चुना गया, क्योंकि मप्र में करीब 83.50 लाख किसान हैं। मप्र को ‘सोया स्टेट’ कहा जाता है, जहां देश के करीब 45 फीसदी सोयाबीन का उत्पादन होता है। करीब 50 लाख किसान सोयाबीन की खेती करते हैं। दरअसल देश की हकीकत यह है कि भारत करीब 60 फीसदी सोयाबीन एवं खाद्य तेल अर्जेन्टीना से आयात करता है और 20 फीसदी तेल ब्राजील से लेते हैं। मात्र 2 फीसदी खाद्य तेल अमरीका से आयात किया जाता है।

भारत दशकों से 75 फीसदी खाद्य तेल और दालें आयात करता रहा है, क्योंकि भारत में खपत इतनी है और भारतीय किसान इतना उत्पादन करने में असमर्थ है। भारत कुल 1.61 लाख करोड़ रुपए का खाद्य तेल आयात करता है। क्या इन दशकों में हिंदुस्तान नहीं बिका? या किसान खत्म नहीं हुए? नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का प्रधानमंत्री मोदी पर गंभीर आरोप है कि उन्होंने अमरीका के साथ व्यापार समझौते के जरिए हिंदुस्तान को ही बेच दिया। वस्त्र उद्योग बर्बाद कर दिया। किसानों को खत्म (सोयाबीन, कपास के संदर्भ में) कर दिया और देश का महत्वपूर्ण डाटा अमरीका को दे दिया। चूंकि राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और प्रधानमंत्री का लगातार विरोध करना ही उनका राजनीतिक दायित्व है। भारत के लोकतंत्र में नेता विपक्ष को ‘छाया प्रधानमंत्री’ कहते हैं, क्योंकि वह दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पद है। राहुल गांधी कुछ भी बोल सकते हैं, लेकिन सच तो यह है कि अभी अमरीका के साथ व्यापार समझौता हुआ ही नहीं है। सिर्फ फ्रेमवर्क हुआ था, जिसे कभी भी खारिज किया जा सकता है। अब अमरीकी सर्वोच्च अदालत के ‘अवैध टैरिफ’ वाले फैसले के बाद दोनों पक्ष पुनर्विचार कर रहे हैं, बैठक भी टाल दी गई है। जब डील हुई ही नहीं, तो देश कैसे बेच दिया गया? इसके अलावा, भारत सरकार के वाणिज्य मंत्री, कृषि मंत्री लिखित तौर पर स्पष्ट कर चुके हैं कि किन कृषि, खाद्य, डेयरी उत्पादों और मसालों को भारत के बाजार में आने की अनुमति अमरीका को नहीं दी गई है। फिर देशहित से सौदा कैसे कर लिया गया? कमोबेश नेता प्रतिपक्ष देश को भ्रमित और गुमराह न करें। कांग्रेस अभी ऐसी महाचौपाल महाराष्ट्र और राजस्थान में भी आयोजित करेगी। बहरहाल यह उनकी राजनीति है, लेकिन एआई शिखर सम्मेेलन के दौरान जो ‘नंगापन’ सामने आया, क्या उसकी कोई भी लीड खुफिया एजेंसियों को नहीं मिली? यह खुफिया तंत्र की गंभीर नाकामी है कि वैश्विक आयोजन में हुड़दंग मच गया।

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