Amalaki Ekadashi 2026: भारत में धर्म, सत्य, अहिंसा, दया और परोपकार जैसे उच्च आदर्शों की परंपरा बहुत पुरानी है. इन्हीं परंपराओं में अनेक व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं. एकादशी व्रत का विशेष महत्व है. आज 27 फरवरी 2026 को हिंदू वर्ष की अंतिम एकादशी को आमलकी एकादशी मनाई जा रही है. इसी दिन से होली महापर्व की शुरुआत मानी जाती है. इसलिए इसे रंगभरी एकादशी, आंवला एकादशी या आंवलकी एकादशी भी कहते हैं.
इस व्रत का वर्णन पद्म पुराण (उत्तराखंड अध्याय 47), ब्रह्मवैवर्त पुराण और ब्रह्म पुराण में मिलता है.
व्रत की विधि और फल
शास्त्रों के अनुसार, इस दिन उपवास, भजन, रात्रि जागरण और भगवान विष्णु के साथ आंवला वृक्ष की पूजा करनी चाहिए. ऐसा करने से जीवन में सुख, समृद्धि और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है. कथा के अनुसार, राजा मांधाता ने वशिष्ठ मुनि से इस व्रत की महिमा सुनी थी. उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति श्रद्धा से आमलकी एकादशी का व्रत करता है, वह धन-समृद्धि पाता है, पापों से मुक्त होता है और मोक्ष का अधिकारी बनता है.
दान और पीले रंग का महत्व
इस व्रत में निष्काम भाव से दान देना बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. खासकर केले, केसर, हल्दी और अन्य पीले रंग की वस्तुओं का दान शुभ माना गया है. व्रत करने वाले को इस दिन पीले वस्त्र पहनना भी लाभकारी बताया गया है. ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान देना वाजपेय यज्ञ के समान फलदायी कहा गया है. इसे हजार गौदान के बराबर पुण्य देने वाला व्रत भी माना गया है.
आंवला वृक्ष की उत्पत्ति
आमलकी एकादशी में आंवला वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है. स्कंद पुराण के अनुसार, जब सृष्टि की रचना के समय धरती जल में डूबी हुई थी, तब ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु की पूजा की. उनकी आंखों से गिरे आनंद के आंसुओं से आंवला वृक्ष उत्पन्न हुआ. कुछ मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा जी के तप के आंसुओं से उत्पन्न होने के कारण आंवला को संसार का पहला फल माना गया है. इसलिए इसे “आदि वृक्ष” भी कहा जाता है. आंवला एक श्रेष्ठ आयुर्वेदिक औषधि है और इसे “अमृत फल” कहा जाता है. शास्त्रों में यह भी उल्लेख है कि आंवला वृक्ष में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का निवास होता है.
मोक्ष प्रदान करने वाला व्रत
भगवान विष्णु को आंवला अत्यंत प्रिय है. इसी कारण आमलकी एकादशी का व्रत करने वाला व्यक्ति विष्णु लोक का अधिकारी माना जाता है. यह व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्रद्धा, दान, संयम और भक्ति का प्रतीक है. सच्चे मन से किया गया यह व्रत जीवन में सुख-शांति और अंत में मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है.














