अहमदाबाद : किसी दंपति के वैवाहिक जीवन का विवाद कोर्ट पहुंचता है तो मुकदमेबाजी चलती है। अगर उनका बच्चा है तो वह भी इस कोर्ट-कचहरी के पचड़े में पिसता है। कई माता-पिता बच्चों को अपने इस झगड़े में खींचते हैं और खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। ऐसे ही मामलों को गुजरात हाई कोर्ट ने आड़े हाथों लिया है। हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में अपने पक्ष में फैसला पाने के लिए दंपतियों के बच्चों की कस्टडी को हथियार और दबाव के रूप में इस्तेमाल करने की कड़ी आलोचना की है। बच्चे की कस्टडी से संबंधित एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति एन एस संजय गौड़ा और डी एम व्यास की पीठ ने दंपति को फटकार भी लगाई।

हाई कोर्ट की बेंच ने कहा, कि इस मामले समेत कई मामलों में माता-पिता में से कोई एक किसी भी तरह बच्चे की हिरासत हासिल करने की कोशिश करता है और इस तरह दूसरे जीवनसाथी को हिरासत संबंधी किसी भी अधिकार से वंचित कर देता है, जिसके परिणामस्वरूप अनुचित मुकदमेबाजी होती है।

हाई कोर्ट ने पैरंट्स को सुनाई

हाई कोर्ट ने आगे कहा, ‘बच्चे की हिरासत को मूल रूप से वैवाहिक विवाद में अपने पक्ष में फैसला पाने के लिए हथियार और दबाव के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है। झगड़ने वाले माता-पिता जो तरीका अपनाते हैं वह गलत है। नाबालिग बच्चे को अनावश्यक आघात पहुंचाता है, जो कई बार यह भी नहीं समझ पाता कि मुकदमा किस बारे में है और क्या यह लड़ाई उसके भले के लिए है।’

बच्चे के कस्टडी का क्या मामला

इस मामले में पालनपुर के एक दंपति शामिल हैं, जिनकी शादी 2020 में हुई थी और मई 2024 में उनका तलाक हो गया। पत्नी अपनी तीन साल की बेटी के साथ अपने मायके चली गई। मामला तब विवादपूर्ण हो गया जब पत्नी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया कि जुलाई 2025 में निष्पादित एक तलाकनामा के तहत बेटी की अभिरक्षा पति को हस्तांतरित कर दी गई थी। उसने आरोप लगाया कि उसे दबाव में आकर इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया था और इसे धोखाधड़ी से निष्पादित किया गया था, जिसमें इसे स्वैच्छिक हस्तांतरण के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया था।

मां को मिली बेटी की कस्टडी

विस्तृत सुनवाई के बाद, हाई कोर्ट ने इस तथ्य की ओर इशारा करते हुए तलाकनामा की प्रामाणिकता पर संदेह व्यक्त किया कि दंपति ने तलाकनामा निष्पादित होने के बाद अदालत से तलाक की डिक्री भी स्वीकार कर ली थी। हाई कोर्ट ने पति को बेटी की अभिरक्षा पत्नी को सौंपने का आदेश दिया और उसे अभिभावक एवं आश्रित अधिनियम के तहत पारिवारिक न्यायालय में उपलब्ध कानूनी उपाय का सहारा लेकर बच्चे की अभिरक्षा का दावा करने की अनुमति दी।

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