हमने बताया था कि करीब 1 करोड़ भारतीय मध्य-पूर्व के खाड़ी देशों में बसे हैं। उन्होंने वहीं घर बना लिए हैं, काम-धंधा जमा लिया है और उनके बच्चे भी वहीं पढ़ रहे हैं। अरब देशों को भारतीयों की बुनियादी जरूरत है, क्योंकि वे तकनीकी और पेशेवर तौर पर हुनरमंद हैं। अरब देशों के पास सिर्फ तेल-गैस के भंडार हैं। न पर्याप्त शिक्षा है, न प्रौद्योगिकी का अपेक्षाकृत कौशल है और सबसे अहम यह है कि वहां लोकतंत्र भी नहीं है। बेशक ईरान में राष्ट्रपति का चुनाव जनता करती है, लेकिन सुप्रीम लीडर ‘मजहबी’ है। राष्ट्रपति भी उसके अधीन काम करते हैं। खाड़ी देशों में शेख, सुल्तान और अमीर आदि की ही हुकूमतें हैं। उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से चुना नहीं गया, बल्कि वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी और वंश-दर-वंश इन देशों पर राज कर रहे हैं। वे बुनियादी तौर पर अमरीका के पि_ू हैं, क्योंकि उनकी मजबूरी है, क्योंकि वे सैन्य रूप से कमजोर देश हैं, बल्कि अमरीका के ही भरोसे हैं। बहरहाल खाड़ी देशों के भारतीय औसतन 10 लाख करोड़ रुपए सालाना भारत में अपने घरों को भेजते हैं। दुनिया भर से भारतीय जितना धन अपने परिवारों को भेजते हैं, उसका एक-तिहाई हिस्सा खाड़ी वाले भारतीय भेजते हैं। उससे भारत की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है। यह राशि भारत के कुल बजट का पांचवां हिस्सा है, जो कई देशों के बजट से अधिक है। भारत ने 2025 में करीब 11.60 लाख करोड़ रुपए का कच्चा तेल अरब देशों से आयात किया है। अधिकांश हिस्सा ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात से ही आयात किया गया है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल-आयातक देश है। यदि तेल के दाम 10 डॉलर भी बढ़ते हैं, तो भारत का आयात-बिल 15 अरब डॉलर सालाना बढ़ जाता है। इस अर्थव्यवस्था को समझा जाना चाहिए।

यदि अमरीका-इजरायल बनाम ईरान युद्ध लंबा खिंचता है, तो क्या यह अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो जाएगी? कमोबेश बड़ी संख्या में भारतीय विस्थापित होकर नहीं लौटेंगे, लिहाजा युद्ध के दौरान उनकी सुरक्षा का सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है। दो दिन के युद्ध ने कच्चे तेल की कीमतें बढ़ा दी हैं। फिलहाल दाम 75-77 डॉलर प्रति बैरल हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतें 100-110 डॉलर तक जा सकती हैं। यह तेल कंपनियों का भी खेल होता है, जिन्हें अपने घाटे कम करने होते हैं। यदि युद्ध अनिश्चित साबित हुआ और कंपनियां अपने तेल टैंकर भेजने को डरती रहीं और तेल दक्षिण अफ्रीका के रूट से भेजना पड़ा, तो उनकी लागत बढ़ेगी। नतीजतन तेल के दाम 150 डॉलर तक भी उछल सकते हैं। भारत बहुत बड़ा देश है, लिहाजा उसकी तेल-गैस की खपत और जरूरत भी व्यापक है, लेकिन भारत के पास तेल भंडार सीमित हो सकते हैं। वेनेजुएला आजकल बहुत कम तेल का उत्पादन कर रहा है और उसका तेल भी भारी है, जिसे रिफाइंड करना मुश्किल और खर्चीला है। हालांकि होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग को आधिकारिक तौर पर बंद नहीं किया गया है, लेकिन उसका नियंत्रण फिलहाल ईरान के अधीन है। विभिन्न देशों के 150 से अधिक तेल टैंकर बंदरगाहों पर फंसे हैं। ईरान ने एक कथित अमरीकी तेल टैंकर पर मिसाइल हमला भी किया है। युद्ध के लक्ष्य और उसके पीछे की रणनीति, कूटनीति कुछ भी रही हो, लेकिन यह युद्ध विश्व अर्थव्यवस्था का डिब्बागोल कर सकता है। मध्य-पूर्व में 3400 से अधिक उड़ानें रद्द करनी पड़ी हैं। दिल्ली-मुंबई से ही 225 उड़ानें रद्द की गई हैं। भारत के 20,000 से ज्यादा यात्री अलग-अलग हवाई अड्डों पर फंसे हैं। विमानन अर्थव्यवस्था का मोटा हिस्सा होता है। 1973 से 1979 के बीच जो युद्ध हुए, उनमें भी तेल की कीमतें चार गुना तक उछलीं। नतीजतन दुनिया में महंगाई और मंदी के दौर आए।

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