ईरान युद्ध के 100 दिन बीत चुके हैं। अब यह अनचाहा युद्ध बनता जा रहा है। न तो अमरीका जीत का दावा कर सकता है और न ही ईरान को आत्मसमर्पण के लिए विवश किया जा सका है। उसके भी विनाशक पलटवार जारी हैं। यह ऐसा युद्ध है, जिससे अमरीका और ईरान अब बाहर निकलना और एक साझा समझौता करना चाहते हैं, लेकिन जिद और महत्वाकांक्षाएं रोड़े अटका रही हैं। यह ऐसा युद्ध है, जिसने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को हिला कर रख दिया है, महामंदी के आकलन किए जा रहे हैं, 146 देशों में तेल-गैस-खाद के संकट गहराते जा रहे हैं और समुद्री सप्लाई चेन का एक महत्वपूर्ण मार्ग लगभग बंद है। नतीजतन विश्व आर्थिकी को 474 लाख करोड़ रुपए की चोट लग चुकी है। यह विभिन्न एजेंसियों के आकलन के निष्कर्ष हैं। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ने चेताया है कि यदि ऊर्जा-बाधा और संकट जारी रहे, तो वैश्विक जीडीपी और रोजगार को गंभीर झटके लगेंगे। विश्व बैंक और आईएमएफ के आकलन पहले ही सामने आ चुके हैं कि वैश्विक जीडीपी की विकास दर 2 फीसदी तक लुढक़ सकती है। बीते 80 साल में, लगभग द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, यह पहला युद्ध है, जिसमें 14 देश प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जुड़े हैं। यह युद्ध ऐसा रहा है, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या कर दी गई। होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग पहली बार बंद हुआ है। खामेनेई समेत करीब 50 लाख के ऐप हैक किए जा चुके हैं। युद्ध में करीब 7000 लोग मारे जा चुके हैं और करीब 55,000 घायल बताए गए हैं। ईरान के करीब 32 लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा है। लेबनान में 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित बताए गए हैं। ऐसा नहीं है कि अमरीका और इजरायल के नुकसान नहीं हुए हैं। अमरीका के सैन्य खर्च, महंगाई और अप्रत्यक्ष प्रभाव आदि पर 100 लाख करोड़ रुपए से अधिक की चपत लग चुकी है। आज अमरीका पर 39 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज है, जबकि उसकी कुल अर्थव्यवस्था 32 ट्रिलियन डॉलर से कुछ अधिक की है। ईरान के जीडीपी और बुनियादी ढांचे को लेकर 28.5 लाख करोड़ रुपए और खाड़ी देशों को ऊर्जा-ढांचों को ध्वस्त करने या जला देने के कारण 5.54 लाख करोड़ रुपए के नुकसान आंके गए हैं। वैश्विक जीडीपी पर 339 लाख करोड़ रुपए का भारी नुकसान माना जा रहा है।

इन नुकसानों और विपरीत, ढहती आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद और 100 दिनों के टकराव, तनाव के बाद भी युद्ध खत्म होने के आसार दिख नहीं रहे हैं। बेशक बीते 60 दिनों से युद्धविराम का ढोंग किया जा रहा है, लेकिन युद्ध रुक-रुक कर जारी रहा है। मिसाइल, ड्रोन के हमले जारी हैं, हवाई हमले भी किए जा रहे हैं, कहीं विस्फोट है, तो कहीं आग की ऊंची-ऊंची लपटों के साथ धुएं के गहरे गुबार हैं। यदि यह अनचाहा, थोपा हुआ, युद्ध महसूस किया जा रहा है, तो समझौते में किसके अहंकार आड़े आ रहे हैं? भारत पर ईरान युद्ध के प्रभावों को लेकर हम विश्लेषण करते रहे हैं, लेकिन अब आम आदमी और रसोई गैस के संदर्भ में विश्लेषण करें, तो कई दरारें सामने आ रही हैं। भारत में रसोई की एलपीजी के उपभोक्ता करीब 33 करोड़ हैं। ‘उज्ज्वला योजना’ के 10.58 करोड़ लाभार्थी हैं। जब से एलपीजी का संकट पैदा हुआ है और लगातार उसके दाम बढ़ाए जा रहे हैं, तब से एलपीजी की खपत 30 फीसदी कम हो गई है। लोग इंडक्शन चूल्हे पर आ गए हैं या लकड़ी-कोयला जला कर रसोई का चूल्हा जिंदा रखे हैं। अब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य मंत्रियों ने बयान जारी रखे हैं कि भारत में अन्य देशों की तुलना में गैस सस्ती दी जा रही है। ये तुलनाएं ही गलत हैं। अमरीका की प्रति व्यक्ति आय 90 लाख रुपए से अधिक है, ऑस्टे्रलिया की यह आय करीब 72 लाख रुपए है, जापान की आय भी हमसे कई गुना ज्यादा है और भारत की प्रति व्यक्ति आय करीब 2.35 लाख रुपए है। इन देशों से तुलना कैसे कर सकते हैं? यह तुलना क्रय-शक्ति के आधार पर की जाती है, जिसमें भारत का उपभोक्ता 10 किलो एलपीजी खरीदने का सामथ्र्य रखता है, तो अमरीकी 200 किलो गैस खरीद सकता है। और अब तो एलपीजी की राशनिंग भी शुरू हो गई है। सरकार महंगाई के साथ औसत कमाई भी देखे। अमरीका-इजरायल बनाम ईरान युद्ध से कई देश बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। डीजल, पेट्रोल और रसोई गैस के दाम बढऩे से अन्य उपभोक्ता वस्तुएं भी महंगी मिलने लगी हैं। दुखद यह है कि आम आदमी की कमाई में कोई इजाफा नहीं हुआ है। इसलिए इस लड़ाई को रोकना जरूरी हो गया है। सक्षम देशों को आगे आकर दोनों पक्षों को युद्ध से पीछे हटने के लिए राजी करना होगा, अन्यथा आम आदमी का भविष्य अंधकार की ओर जा रहा है। यह काम प्राथमिकता के साथ होना चाहिए।

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