International Desk: अमेरिका-इजरायल के हमलों के बीच ईरान को चीन-रूस से सीधी सैन्य मदद की उम्मीद नहीं है। अब सऊदी अरब से हालिया समझौतों के कारण पाकिस्तान भी खुलकर तेहरान के समर्थन में नहीं आएगा। क्षेत्रीय समझौते, आर्थिक निर्भरता और रणनीतिक संतुलन ईरान को मैदान में लगभग अकेला छोड़ रहे हैं।

क्यों नहीं बचा सकते चीन और रूस?
Russia और China, दोनों ईरान से हजारों किलोमीटर दूर हैं। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए व्यापक सैन्य हमलों और सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा सवाल गूंज रहा है क्या चीन, रूस या पाकिस्तान ईरान को बचाने आगे आएंगे? पहली नजर में लगता है कि तेहरान के पास मजबूत साझेदार हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कहीं ज्यादा जटिल है। United States की तरह उनके पास खाड़ी क्षेत्र में स्थायी सैन्य अड्डे और लॉजिस्टिक नेटवर्क नहीं हैं। रूस पहले से Ukraine युद्ध में उलझा है, जबकि चीन वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा को जोखिम में नहीं डालना चाहता।दोनों देश हथियार और बयान दे सकते हैं, लेकिन अमेरिकी सेना से सीधा टकराव मोल लेना उनके लिए संभव नहीं।

पाकिस्तान क्यों नहीं आएगा आगे?
ईरान को कभी उम्मीद रहती थी कि पड़ोसी मुस्लिम देश संकट में उसका साथ देंगे। लेकिन आज की हकीकत अलग है।Pakistan और Saudi Arabia के बीच हाल के वर्षों में सुरक्षा और रक्षा सहयोग गहरा हुआ है। सऊदी अरब ने पाकिस्तान को आर्थिक सहायता, तेल आपूर्ति में राहत और निवेश पैकेज दिए हैं। बदले में पाकिस्तान ने खाड़ी सुरक्षा और सैन्य सहयोग को मजबूत किया है। दोनों देशों के बीच समझ है कि वे एक-दूसरे के खिलाफ किसी भी आक्रामक कार्रवाई में शामिल नहीं होंगे और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखेंगे।ईरान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। ऐसे में पाकिस्तान खुलकर तेहरान के पक्ष में सैन्य भूमिका लेता है, तो वह रियाद के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को खतरे में डाल देगा।

पाकिस्तान की रणनीतिक मजबूरी

  • पाकिस्तान पहले से आर्थिक संकट और IMF कार्यक्रम के दबाव में है।
  • वह खाड़ी देशों की वित्तीय मदद पर निर्भर है।
  • अगर वह ईरान के समर्थन में सीधे उतरता है, तो सऊदी सहायता पर असर पड़ सकता है
  • खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों पाकिस्तानी श्रमिकों की स्थिति प्रभावित हो सकती है
  • क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ सकता है
  • इसलिए इस्लामी एकजुटता की बयानबाज़ी अलग बात है, लेकिन सैन्य दखल अलग।
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ईरान की बढ़ती कूटनीतिक तन्हाई
Iran को चीन और रूस से सीमित समर्थन मिलेगा, पाकिस्तान से राजनीतिक सहानुभूति मिल सकती है, लेकिन सीधी सैन्य भागीदारी की संभावना बेहद कम है। यह संकट दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिश्ते भावनाओं पर नहीं, हितों पर टिके होते हैं। चीन-रूस की दूरी, पाकिस्तान की सऊदी निर्भरता और वैश्विक शक्ति संतुलन  कारण  ईरान  इस संघर्ष में लगभग अकेला खड़ा रह गया है। संकट के समय स्पष्ट हो जाता है कि “रणनीतिक साझेदारी” और “सैन्य बलिदान” दो अलग बातें हैं।

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