इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध में जान-माल के नुकसान के साथ-साथ विश्व धरोहर स्थलों को भी नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आ रही हैं. UNESCO ने जानकारी दी है कि ईरान की राजधानी तेहरान में स्थित विश्व धरोहर स्थल गोलिस्तान पैलेस को पास में हुए हवाई हमले के कारण नुकसान पहुंचा है. यूनेस्को के अनुसार, अरग स्क्वायर के आसपास हुए हमले के बाद उठे मलबे और धमाके की तीव्र तरंगों से महल के कुछ हिस्से प्रभावित हुए. गोलिस्तान पैलेस (गुलाबों का महल) का भारत से भी ऐतिहासिक संबंध जुड़ा है. महल के सलाम हॉल में कभी प्रसिद्ध मयूर सिंहासन रखा गया था.

यूनेस्को ने बयान जारी कर कहा कि वह ईरान और पूरे क्षेत्र में सांस्कृतिक धरोहरों की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है, ताकि उनके संरक्षण के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकें. रिपोर्टों के मुताबिक, हालिया अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद इस ऐतिहासिक परिसर को क्षति पहुंचने की सूचना मिली. ईरान के सांस्कृतिक विरासत मंत्री सैयद रेज़ा सालेही अमीरी ने मौके का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया. वहीं विशेषज्ञ टीमों द्वारा नुकसान का आकलन किया जा रहा है. यह महल 1954 के हेग कन्वेंशन के तहत संरक्षित सांस्कृतिक संपत्ति की श्रेणी में आता है, जो सशस्त्र संघर्ष के दौरान विरासत स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है.

गोलिस्तान पैलेस का इतिहास

यूनेस्को के विवरण के अनुसार, गोलिस्तान पैलेस काजार काल की एक उत्कृष्ट वास्तु कृति है, जिसमें पारंपरिक फारसी कला और शिल्प का पश्चिमी स्थापत्य प्रभावों के साथ अनोखा संगम दिखाई देता है. तेहरान की प्राचीनतम इमारतों में शामिल यह परिसर आठ प्रमुख संरचनाओं का समूह है. तेहरान के इस के प्राचीन गढ़ की नींव सफ़वीद दौर में शाह तहमास्प प्रथम के शासनकाल में रखी गई मानी जाती है, जबकि बाद में शाह अब्बास महान ने इसके उत्तरी हिस्से में एक भव्य बाग़ विकसित कराया. समय के साथ किले के चारों ओर ऊँची प्राचीर खड़ी की गई और परिसर में कई नई इमारतें जोड़ी गईं. 18वीं सदी में ज़ंद वंश के शासक करीम खान ने इसका पुनरुद्धार कराया. 

जब 1794 से 1925 तक शासन करने वाले काजार शासकों ने तेहरान को अपनी राजधानी बनाया, तो यही परिसर उनका आधिकारिक निवास बन गया. 1865 में इसी वंश के हाजी अबोल हसन मिमार नवाई ने इसे मौजूदा स्वरूप दिया. बाद में 1925 से 1979 तक के पहलवी शासनकाल में Golestan Palace राजकीय और औपचारिक समारोहों का मुख्य केंद्र रहा, जहां 1926 में रजा शाह और 1967 में मोहम्मद रज़ा शाह व शहबानू फराह का राज्याभिषेक संपन्न हुआ. हालांकि रज़ा शाह ने 1925 से 1945 के बीच परिसर के बड़े हिस्से को यह कहकर ध्वस्त करवा दिया कि वह आधुनिक तेहरान के विस्तार में बाधा बन रहा था.

इस परिसर में 17 संरचनाएं थीं, जिनमें संग्रहालय, महल और सभागार शामिल थे. अधिकांश निर्माण क़ाजार वंश के 131 वर्षों के शासनकाल में हुआ. हवाई हमलों से पहले यहां पांडुलिपियों की एक समृद्ध लाइब्रेरी, फोटोग्राफिक अभिलेखागार और ऐतिहासिक दस्तावेजों का संग्रह मौजूद था. गोलिस्तान पैलेस आधुनिक ईरान की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक रहा है. 1974 में जारी 5,000 ईरानी रियाल के नोट के पिछले हिस्से पर भी इसकी तस्वीर अंकित थी. गोलिस्तान पैलेस में मार्बल थ्रोन (संगमरमर सिंहासन) , करीम खानी नुक्कड़, पॉन्ड हाउस, ब्रिलियंट हॉल, आइवरी हॉल, मिरर हॉल, सलाम हॉल, डायमंड हॉल,विंडकैचर मेंशन, एडिफाइस ऑफ द सन और अबीअज पैलेस समेत और भी कई आकर्षक निशान थे.

कभी मुगल काल का मयूर सिंहासन भी रखा गया था इस पैलेस में 

चारदीवारी से घिरा यह परिसर बाग-बगीचों, जलाशयों और सुसज्जित इमारतों के लिए प्रसिद्ध है, जिनकी भव्य सजावट मुख्यतः 19वीं सदी की मानी जाती है. वर्तमान में यहां संग्रहालय और ऐतिहासिक वस्तुओं का भी संग्रह है, जिसके चलते इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया. 1950 और 1960 के दशक में पुराने ढांचों की जगह आधुनिक और व्यावसायिक इमारतों का निर्माण किया गया. कभी गोलिस्तान पैलेस में रखा गया मयूर सिंहासन मुगल सम्राट शाह जहां द्वारा 17वीं सदी में बनवाया गया था और दिल्ली के लाल किले में स्थापित था. 1739 में ईरान के शासक नादिर शाह ने दिल्ली पर आक्रमण कर मुगल सम्राट मुहम्मद शाह को पराजित किया और अपार संपत्ति के साथ मयूर सिंहासन भी फारस ले गया. इतिहासकारों के अनुसार, 1747 में नादिर शाह की हत्या के बाद मयूर सिंहासन को उसके कीमती रत्नों के लिए संभवतः तोड़ दिया गया. उससे पहले तक यह गोलिस्तान पैलेस में ही सुरक्षित रखा गया था.

युद्ध की आग में बिखर रहा गोलिस्तान पैलेस 

गोलिस्तान पैलेस ईरान के इतिहास के कई अहम मोड़ों का साक्षी रहा है. यहां शाही ताजपोशी समारोह आयोजित हुए और संवैधानिक आंदोलनों के दौर भी देखे गए. क़ाजार वंश के पतन के बाद भी यह महल बाद के शासकों के समय में औपचारिक और राजकीय कार्यक्रमों का प्रमुख स्थल बना रहा. गोलिस्तान पैलेस जैसे सांस्कृतिक स्मारक केवल किसी एक देश की धरोहर नहीं होते, बल्कि वे मानव सभ्यता की साझा विरासत का प्रतीक हैं. यही वजह है कि युद्ध के दौरान ऐतिहासिक स्थलों को होने वाला नुकसान वैश्विक चिंता का विषय बन जाता है. कभी फारसी विरासत का भव्य प्रवेशद्वार माना जाने वाला यह ऐतिहासिक महल अब संघर्ष की मार से टूटे कांच और मलबे के नीचे दबा पड़ा है और उसकी शान युद्ध की आग में बिखर रही है.

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