पृथ्वी की कक्षा में घूमता हर छोटा-बड़ा मलबा अब सिर्फ तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि भविष्य के मिशनों के लिए खतरे की घंटी भी है। ऐसे में भारत ने न सिर्फ इस खतरे को पहचाना है, बल्कि उसे खत्म करने का संकल्प भी ले लिया है। लोकसभा में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि भारतीय मिशनों से जुड़े 129 ट्रैक करने योग्य मलबे के टुकड़े इस समय कक्षा में मौजूद हैं। यह आंकड़ा भारत के बढ़ते अंतरिक्ष कार्यक्रम का साइड-इफेक्ट ज़रूर है, लेकिन अब इसे नियंत्रित करना प्राथमिकता बन चुका है।
भारत ने मिलाया नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी से हाथ
भारत ने अंतरिक्ष से कचरा साफ करने के लिए नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी से हाथ मिलाया है। इसरो ने वैश्विक स्पेस एजेंसियों के साथ मिलकर अंतरिक्ष को सुरक्षित बनाने की मुहिम में सक्रिय भागीदारी निभाने की ठान ली है। इसरो ने ‘डेब्री फ्री स्पेस मिशन’ के ज़रिए 2030 तक ‘जीरो डेब्री’ का लक्ष्य तय किया है।
क्या कर रहे उपाय?
भारत में स्पैडेक्स मिशन में डॉकिंग और रोबोटिक आर्म तकनीक का सफल परीक्षण हुआ, जो भविष्य में अंतरिक्ष कचरा हटाने में मदद करेगी। वहीं सैटेलाइट्स को मिशन के बाद वायुमंडल में जलाकर नष्ट करने की योजना है और 509 करोड़ का ‘नेट्रा प्रोजेक्ट’ टकराव से पहले सैटेलाइट को चेतावनी देकर सैटेलाइट्स को सुरक्षित रास्ता देता है। अंतरिक्ष से कचरा साफ करने के लिए भारत डेब्री-फ्री दृष्टिकोण भी अपनाएगा, जैसे स्वच्छ ऑर्बिट चुनना, रॉकेट्स के लिए अतिरिक्त ईंधन बुक करना, और री-एंट्री पर नियंत्रित जलना। इसके साथ ही रोबोटिक आर्म, रेंडेजवूस और प्रॉक्सिमिटी ऑपरेशंस पर भी रिसर्च चल रही है, जो सक्रिय डेब्री रिमूवल के पूर्वाधार हैं।
आंकड़ों में चुनौती
लो-अर्थ ऑर्बिट में 23 और जियोस्टेशनरी ऑर्बिट में 26 निष्क्रिय सैटेलाइट टुकड़ों के अलावा रॉकेट अवशेषों में पीएसएलवी के 40, जीएसएलवी के 4 और एलवीएम3 के 3 टुकड़े शामिल हैं। वहीं अकेले पीएसएलवी-सी3 रॉकेट के टूटने से 33 टुकड़े बने। इस तरह कुल मिलाकर अंतरिक्ष में भारत से जुड़े 129 मलबे के टुकड़े मौजूद हैं। हालांकि इन आंकड़ों के लिए यह भी चुनौती है कि असल आंकड़ा इससे कहीं ज़्यादा हो सकता है।



















