नई दिल्ली, कहा जाता है कि अगर लड़कियां दोस्त होती हैं और उनके साथ कोई रोमांटिक संबंध नहीं होता, तो वे कहीं न कहीं पुरुषों को कई छोटी-छोटी अच्छी आदतें सिखा देती हैं। लेकिन उनकी छोटी-छोटी केयर को अगर कोई प्यार समझ ले और फिर रिश्ते में आने के लिए दबाव बनाए, तो समस्या खड़ी हो जाती है। ऐसे सोच रखने वालों के लिए दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि केवल दोस्ती के नाम पर सहमति नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर कोई लड़की सिर्फ दोस्ती के नाते बात करती है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसके साथ जबरन संबंध बनाए जाएं। बता दें कि अदालत ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि ‘वैलेंटाइन डे’ जैसे किसी विशेष अवसर की आड़ लेकर किसी भी तरह की शारीरिक जबरदस्ती या यौन उत्पीड़न को तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने आरोपी की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें इस कृत्य को ‘आपसी सहमति’ का परिणाम बताया गया था। अदालत ने अपने आदेश में पीड़िता की दृढ़ता को रेखांकित करते हुए कहा कि उसके बयानों में शुरू से अंत तक रही एकरूपता, अदालत में उसकी सक्रिय उपस्थिति और जमानत का पुरजोर विरोध इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि यह मामला सहमति का कतई नहीं था। हाई कोर्ट का यह फैसला कानून के उन गलियारों में एक नजीर (मिसाल) के रूप में देखा जा रहा है, जहां अक्सर ‘सहमति’ की परिभाषा को तोड़-मरोड़कर कानूनी बचाव का रास्ता खोजने का प्रयास किया जाता है।

मामला क्या था?

यह मामला साल 2025 में दर्ज एक प्राथमिकी (FIR) से संबंधित है, जिसमें पीड़िता ने गंभीर आरोप लगाए थे। पुलिस में दर्ज की गई शिकायत के अनुसार, आरोपी लड़के से पिछले एक साल से संपर्क में थी। वह फोन पर भी बात करती थी। एक दिन आरोपी ने उसे अपने घर बुलाया और न केवल उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन उसकी मांग में सिंदूर भरा, बल्कि उसकी असहमति के बावजूद शारीरिक संबंध भी बनाए। हालांकि, आरोपी ने अदालत में खुद को निर्दोष बताते हुए दलील दी कि पीड़िता बालिग थी और यह सब आपसी रजामंदी से हुआ था, लेकिन अदालत ने इन तर्कों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

दोस्ती का अर्थ ‘सहमति’ नहीं

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने आधुनिक सामाजिक संबंधों और ‘सहमति’ (Consent) की सीमाओं पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्पष्ट रुख अपनाया। अदालत ने आरोपी की दलीलों को खारिज करते हुए कड़े शब्दों में कहा कि महज किसी महिला के साथ मित्रता होने का यह अर्थ कतई नहीं लगाया जा सकता कि वह हर प्रकार की शारीरिक या अन्य गतिविधियों के लिए अपनी रजामंदी दे चुकी है। कोर्ट ने इस धारणा को पूरी तरह गलत और निराधार बताते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी रिश्ते में ‘ना’ का अर्थ ‘ना’ ही होता है और दोस्ती की आड़ में किसी की गरिमा के साथ खिलवाड़ या जबरदस्ती को कानूनन सही नहीं ठहराया जा सकता।

आरोपी को नहीं मिली राहत

अदालत ने आगे टिप्पणी की कि किसी महिला की मर्जी के बिना उसकी मांग भरना न केवल अनुचित है, बल्कि यह आरोपी की जबरदस्ती करने की मंशा को भी साफ तौर पर दर्शाता है। भले ही सिंदूर भरना अपने आप में अलग अपराध की श्रेणी में न आता हो, लेकिन इस मामले के संदर्भ में यह उत्पीड़न का हिस्सा माना गया। दिल्ली पुलिस द्वारा जमानत याचिका का कड़ा विरोध किए जाने के तर्कों को सही मानते हुए, कोर्ट ने आरोपी को राहत देने से मना कर दिया।

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