कर्नाटक में महिलाओं के लिए लागू पीरियड लीव नीति अब कानूनी विवाद का विषय बन गई है। राज्य सरकार द्वारा नवंबर 2025 में लागू इस आदेश को लेकर अलग अलग कंपनियों की महिला कर्मचारियों ने आपत्ति जताई है। इस मामले में करीब 17 महिलाओं ने कर्नाटक हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए इस नीति को रद्द करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह कदम महिलाओं के लिए सहायक नहीं बल्कि उनके करियर के लिए बाधा बन सकता है।
न्यायमूर्ति अनंत रामनाथ हेगड़े की बेंच करेगी सुनवाई
रिपोर्ट के अनुसार दायर याचिका में कहा गया है कि यह नीति समानता के सिद्धांत के खिलाफ है और इससे महिलाओं की कार्यस्थल पर छवि प्रभावित हो सकती है। मामला फिलहाल न्यायमूर्ति अनंत रामनाथ हेगड़े की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अनिवार्य पीरियड लीव लागू करने से नियोक्ता महिलाओं को कम सक्षम मान सकते हैं। उनका कहना है कि कंपनियां भर्ती के समय महिलाओं को प्राथमिकता देने से बच सकती हैं क्योंकि उन्हें अतिरिक्त छुट्टी देनी होगी। इस वजह से महिलाओं के रोजगार अवसरों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
महिलाओं की पहचान होगी कमजोर
महिलाओं ने यह भी कहा कि यह नीति महिलाओं को अलग श्रेणी में रखती है और उन्हें जैविक आधार पर परिभाषित करती है। इससे कार्यस्थल पर उनकी पेशेवर पहचान कमजोर हो सकती है। याचिका में स्पष्ट किया गया कि समानता का मतलब विशेष सुविधा देना नहीं बल्कि समान अवसर सुनिश्चित करना है। बता दें कि कर्नाटक की कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने 20 नवंबर 2025 को यह आदेश जारी किया था। इसके तहत 18 से 52 वर्ष की महिलाओं को हर महीने एक दिन का सवेतन अवकाश देने का प्रावधान किया गया है। यह नियम स्थायी, अनुबंध और आउटसोर्स कर्मचारियों पर भी लागू होता है।
महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए लिया गया फैसला
सरकार का उद्देश्य महिलाओं के स्वास्थ्य और कार्य संतुलन को बेहतर बनाना था। खासतौर पर गारमेंट और आईटी सेक्टर में काम करने वाली महिलाओं को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया था। हालांकि अब इसी नीति को लेकर बहस तेज हो गई है कि क्या यह वास्तव में सशक्तिकरण है या भेदभाव।
लैंगिक समानता की दिशा में हुई प्रगति पर प्रभाव
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि कार्यस्थल पर वास्तविक समानता समावेशी माहौल से आती है, न कि अलग अलग नियम बनाकर। उन्होंने सुझाव दिया कि सभी कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य और वेलबीइंग से जुड़ी नीतियां बनाई जानी चाहिए, बजाय इसके कि केवल महिलाओं के लिए विशेष नियम बनाए जाएं। उनका यह भी कहना है कि यह नीति अनजाने में महिलाओं को कम उत्पादक या ज्यादा अनुपस्थित दिखा सकती है। इससे दशकों से चल रही लैंगिक समानता की दिशा में हुई प्रगति पर असर पड़ सकता है। अब हाईकोर्ट का फैसला इस बहस को नई दिशा देगा।



















