विश्व आज एक नए संकट के कगार पर खड़ा है। 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए अमरीका-इसराईल और ईरान युद्ध ने मात्र 4 सप्ताह में वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है। ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’, जिससे दुनिया के 20 प्रतिशत तेल और एल.एन.जी. का परिवहन होता है, प्रभावी रूप से बंद हो गया है। ईरान के साऊथ पार्स गैस फील्ड और कतर के रास लाफान एल.एन.जी. प्लांट पर हमलों से वैश्विक उत्पादन में 3.5 प्रतिशत की कमी आई है, जिसकी मुरम्मत में वर्षों लग सकते हैं। तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं, जबकि भारत जैसे आयात-निर्भर देशों में ईंधन, एल.पी.जी. और बिजली की आपूर्ति पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में ‘ऊर्जा लॉकडाऊन’ की चर्चा जोर पकड़ रही है। एक ऐसी स्थिति, जिसमें ईंधन राशनिंग, बिजली कटौती और औद्योगिक गतिविधियों पर अंकुश लग सकता है, ठीक कोविड जैसी आपात स्थिति की तरह।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजैंसी (आई.ई.ए.) के प्रमुख फितह बिरोल ने इसे ‘मेजर, मेजर थ्रैट’ बताया है। होर्मुज बंद होने से न केवल तेल, बल्कि उर्वरक, हीलियम और सल्फर की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है, जो खाद्य उत्पादन और ए.आई. तकनीक तक को प्रभावित कर रही है। बंगलादेश ने पहले ही ईंधन राशङ्क्षनग लागू कर दी है। श्रीलंका में अनिवार्य ऊर्जा अवकाश की घोषणा हुई है। भारत में भी पैट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं, एल.पी.जी. सिलैंडर की आपूर्ति अनिश्चित है और बिजली संयंत्रों में कोयला-गैस का संकट गहरा रहा है। यदि युद्ध लंबा चला तो ‘ऊर्जा लॉकडाऊन’ वास्तविकता बन सकता है। यानी उद्योग बंद, परिवहन सीमित और घरेलू बिजली पर पाबंदी। यह न केवल मुद्रास्फीति बढ़ाएगा, बल्कि विकास दर को 1-2 प्रतिशत तक घटा सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि होर्मुज 2-3 महीने और बंद रहा तो वैश्विक मंदी अनिवार्य हो जाएगी। लेकिन संकट के बीच आशा की किरण भी दिख रही है। शांति वार्ता की संभावना बन रही है और इसमें पाकिस्तान की भूमिका अचानक केंद्र में आ गई है। खबरों के अनुसार, अमरीकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर ग़लीबाफ के बीच इस्लामाबाद में संभावित शिखर वार्ता की तैयारी चल रही है। पाकिस्तान ने 15 प्वॉइंट प्रस्ताव अमरीका की ओर से ईरान तक पहुंचाया है, जिसमें होर्मुज खोलने, यूरेनियम संवर्धन सीमा और मुआवजे जैसे मुद्दे शामिल हैं।

सवाल उठता है कि क्या युद्धविराम संभव है? कूटनीतिक विशेषज्ञों की राय विभाजित है। कुछ का मानना है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता एक ‘टर्निंग प्वॉइंट’ साबित हो सकती है क्योंकि दोनों पक्ष थक चुके हैं। तेल की महंगाई के चलते अमरीका को घरेलू आर्थिक दबाव और इसराईल को क्षेत्रीय विस्तार की सीमा का सामना करना पड़ रहा है। ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही चरमरा रही है।  वाशिंगटन इंस्टीच्यूट और स्टिमसन सैंटर के विश्लेषकों का कहना है कि यह युद्ध ‘कोई स्पष्ट विजेता’ नहीं देगा। इसराईल के हमलों से ईरान की ऊर्जा सुविधाएं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, जिनकी मुरम्मत में वर्षों लगेंगे। ईरान की ओर से जवाबी हमले अभी भी जारी हैं। यदि युद्धविराम हो भी गया तो भी ‘दूसरे चरण’ के मुद्दे जैसे कि परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और मुआवजा आदि बने रहेंगे। 

यदि पाकिस्तान सफल हुआ तो भारत को फायदा होगा, क्योंकि हमारा 60 प्रतिशत तेल आयात मध्य-पूर्व से आता है लेकिन भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए, जैसे कि रणनीतिक भंडार बढ़ाना, नवीकरणीय ऊर्जा को तेज करना और रूस-मध्य एशिया से आयात विविधीकरण करना। ‘ऊर्जा लॉकडाऊन’ से बचने का एकमात्र रास्ता कूटनीति है। लेकिन यदि युद्ध जारी रहा तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। भारत जैसे विकासशील देशों को हर स्थिति के लिए तैयार रहना होगा, न केवल संकट प्रबंधन के लिए, बल्कि दीर्घकालिक ऊर्जा स्वतंत्रता के लिए भी। यह संकट हमें याद दिलाता है कि युद्ध अब केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि ऊर्जा पाइपलाइनों और आर्थिक आपूर्ति शृंखलाओं पर भी लड़ा जाता है। गौरतलब है कि शांति की अपील सभी पक्षों, अमरीका, इसराईल, ईरान और मध्यस्थ देशों से होनी चाहिए। अन्यथा, दुनिया भर में ‘ऊर्जा लॉकडाऊन’ का साया काफी देर तक मंडराता रहेगा।-रजनीश कपूर

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