ईरान से जारी युद्ध के बीच अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ट्रुथ सोशल पर तत्काल हमले रोकने और बातचीत के पोस्ट से दुनिया में हलचल मच गई। ट्रम्प का पोस्ट सामने आने के साथ ईरान का किसी प्रकार की बातचीत से इंकार करने का बयान कई प्रश्न खड़ा करता है। इस तरह के पोस्ट से सहसा यह संदेश जाएगा ही कि अमरीका ने युद्ध रोक दिया है और बातचीत इस अवस्था में पहुंची है कि युद्धविराम हो जाएगा। किंतु पोस्ट के बावजूद अमरीका की ओर से ईरान पर हमले हो रहे हैं और दोनों लड़ रहे हैं।

इस पोस्ट में युद्धविराम शब्द का उल्लेख नहीं है। ध्यान रखिए, इसमें केवल बिजली व ऊर्जा प्रतिष्ठान पर हमले न करने की बात है। दूसरे, इसमें मध्य-पूर्व में दुश्मनी खत्म करने का न्यूनतम अर्थ इसराईल राष्ट्र को औपचारिक रूप से स्वीकार करना या मान्यता देना, यरुशलम को उसकी राजधानी मानना तथा अरब देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। ये कितने कठिन हैं, बताने की आवश्यकता नहीं। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही इसका बड़ा लक्ष्य इसराईल का राष्ट्र के रूप में अस्तित्व समाप्त करना है। क्या इस्लामिक राज्य अपने लक्ष्य को छोड़ देगा? क्या यरूशलम पर कब्जा और अल अक्सा मस्जिद को इस्लामी शासन के अंतर्गत लाने के उद्देश्य का परित्याग कर देगा? शिया इस्लामी देश को सर्व शक्तिशाली यानी हर स्तर की सैन्य शक्ति को विस्तारित करने की प्रक्रिया पर विराम लगा देगा? ट्रम्प प्रशासन की ओर से दिया गया 15 सूत्री प्रस्ताव इसी की पुष्टि करता है। इसे स्वीकार करने का मतलब होगा कि ईरान इसराईल केंद्रित अपनी सभी गतिविधियां समाप्त करेगा तथा न्यूक्लियर कार्यक्रम एवं सैन्य शक्ति के लिए अमरीका की इच्छा अनुसार ही आगे काम कर पाएगा।

कुछ विश्लेषकों का मत है कि ट्रम्प पर आंतरिक दबाव है क्योंकि युद्ध के खर्चे से अर्थव्यवस्था पर उल्टा प्रभाव हो रहा है। चूंकि युद्ध संपूर्ण विश्व को दुष्प्रभावित कर रहा है, इसलिए अधिकतर देश इसका अंत चाहते हैं। अमरीका में लोगों को संदेह है कि ट्रम्प आगे टैक्स लगाएंगे और महंगाई बढ़ेगी। उन्होंने अमरीकी कांग्रेस से 200 अरब डॉलर की मांग की है। ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि यह युद्ध के लिए नहीं, पहले से प्रस्तावित है और पूरक है।   लेकिन दबाव अमरीका पर होगा, ईरान पर नहीं, यह तर्क हास्यास्पद है। डेढ़ दर्शक से ज्यादा के प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है। हमलों से पूर्व ईरान की ध्वस्त अर्थव्यवस्था और बढ़ती महंगाई ने शासन के विरुद्ध असंतोष को इतना बढ़ा दिया था कि भारी संख्या में लोग सड़कों पर उतर कर सत्ता बदलने की मांग कर रहे थे। इनको अयातुल्ला के आदेश से निर्ममता से कुचला गया था। इसलिए ईरान दबाव मुक्त होकर लंबे समय तक युद्ध करता रहेगा, ऐसा निष्कर्ष उनका होगा जो यथार्थ को नहीं समझते या समझकर भी अनदेखी करते हैं।

युद्ध ने ईरान द्वारा विनाशकारी हथियारों के निर्माण और मिसाइल कार्यक्रम को अनुमान से काफी अधिक विस्तार के आरोपों को सही साबित किया है। अगर वह डिएगो गाॢसया में 4000 किलोमीटर से ज्यादा तक मिसाइल हमले कर सकता है तो इसका अर्थ है ईरान के शस्त्रास्त्रों को लेकर जो अनेक रक्षा विश्लेषक अमरीका को झूठा साबित करने की कोशिश कर रहे थे वे सही नहीं थे। इस दृष्टि से भी अमरीका के लिए उसको कमजोर करना अपरिहार्य हो गया है अन्यथा अरब देश भी रक्षा के लिए नाभिकीय हथियारों की सीमा तक जाने की कोशिश कर सकते हैं। इसराईल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने ट्रम्प के पोस्ट के 3 दिन पहले कहा था कि उनका युद्ध अमरीका से अलग है। इसका अर्थ है कि अमरीका कभी हमले रोकने या युद्ध न करने की घोषणा कर दे तो भी इसराईल उसका अनुपालन करने को बाध्य नहीं है।  
वैसे डोनाल्ड ट्रम्प ने यह भी नहीं बताया कि किस ईरानी नेता से बातचीत हो रही है। उन्होंने कहा कि वार्ताकार एक ‘शीर्ष व्यक्ति’ हैं, जो उस देश में ‘सबसे सम्मानित’ हैं। उन्होंने पश्चिम एशिया के लिए विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर का नाम वार्ताकार के रूप में लिया। ईरान बातचीत से इंकार कर रहा है लेकिन संभव है पर्दे के पीछे कुछ संपर्क हुआ हो। सूचना है कि पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरान के राष्ट्रपति के साथ बातचीत की है। पाकिस्तान की हैसियत किसी मामले में प्रभावकारी भूमिका निभाने की नहीं हो सकती। पाकिस्तान ईरान को मना लेगा यह सोचना ही हास्यास्पद है। 

मुख्य बात है कि आखिर अमरीकी हमले का लक्ष्य क्या था? पहला, अयातुल्ला खामेनेई सहित शीर्ष नेतृत्व को समाप्त करना। इसमें काफी हद तक सफलता मिली। दूसरा, सैन्य और आॢथक दृष्टि से कमर तोडऩा। ईरान की सैन्य शक्ति उससे ज्यादा है, जितना आकलन किया गया था। तो इस लक्ष्य की प्राप्ति अभी कठिन है किंतु आंशिक रूप से हुई है। तीसरा लक्ष्य सत्ता परिवर्तन करना था जो अभी संभव नहीं दिख रहा। इस्लाम के लिए जीने मरने की भावना इसकी शक्ति है। अमरीका तथा इसराईल अभी इस लक्ष्य की ओर शायद ही बढ़ें। किंतु वे सत्ता को इतना दुर्बल अवश्य बनाना चाहेंगे ताकि आंतरिक विद्रोह के कारण परिवर्तन की संभावना सशक्त हो और उसमें उनकी भूमिका हो। इसे समझने वालों का निष्कर्ष यही होगा कि ट्रम्प के पोस्ट को एकाएक युद्ध रोकने के रूप में नहीं लिया जाए। संभव है उनकी रणनीति हो।-अवधेश कुमार 

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