प्राचीन काल में भारत में जब बेटी की शादी की जाती थी तो उसे सोना, चांदी, वस्त्र, जमीन या अन्य संपत्ति के रूप में ‘स्त्रीधन’ दिया जाता था।  इसका मूल उद्देश्य पिता द्वारा बेटी की आॢथक सुरक्षा सुनिश्चित करना था, क्योंकि उस समय महिलाओं के पास आय के साधन सीमित होते थे। बेटियों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया जाता था, इसलिए ‘स्त्रीधन’ के रूप में उन्हें उनका अधिकार देने की परम्परा थी। लेकिन यह परंपरा अब विकृत हो गई है और स्वेच्छा से दिए जाने वाले ‘स्त्रीधन’ की जगह वर पक्ष द्वारा की जाने वाली मांगों यानी दहेज ने ले ली है, जो एक सामाजिक बुराई बन गया और इसके कारण उत्पीडऩ और ङ्क्षहसा जैसी समस्याएं पैदा होने लगीं। नैशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की 2025 में पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार 2023 में भारत में 6100 महिलाओं की हत्या दहेज के लिए की गई। यह आंकड़ा 2022 के मुकाबले 14 प्रतिशत अधिक है। इसी महीने के दौरान सामने आए दहेज हत्याओं के मामले निम्न में दर्ज हैं : 

* 5 मार्च को ‘उत्तराखंड’ के देहरादून में शादी के महज तीन महीने बाद  विवाहिता की हत्या कर दी गई। मृतका ‘कहकशां आलम’ की शादी 19 नवम्बर, 2025 को हुई थी। परिजनों का आरोप है कि 18 फरवरी की रात ‘कहकशां’ ने अपने भाई को फोन कर बताया था कि उसके ससुराल वाले प्लॉट खरीदने के लिए 50 लाख रुपए की मांग कर रहे हैं और उसे लगातार परेशान किया जा रहा था।
* 15 मार्च को ‘बेंगलुरु’ में एक 22 वर्षीय गृहिणी ‘श्रुति’ ने दहेज उत्पीडऩ से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। एक निजी बैंक में कार्यरत ‘श्रुति’ के पति ‘पवन कल्याण’ के ऊपर उसे दहेज के लिए प्रताडि़त करने का आरोप है। महिला की शादी 16 महीने पहले ही हुई थी।
* 16 मार्च को गुडग़ांव में पुलिस ने ‘नूह’ के बदोरपुर गांव में एक कुएं में 28 वर्षीय महिला और उसकी तीन बेटियों के शव मिलने के लगभग एक सप्ताह बाद उसके पति को उसे आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार किया। पुलिस के मुताबिक आरोपी ‘शाहिद’ अपनी पत्नी ‘साहिला’ को दहेज के लिए लगातार प्रताडि़त कर रहा था और उसके साथ मारपीट की जाती थी। इसी कारण ‘साहिला’ अपने बच्चों ‘अक्षा’ (5), ‘सानिया’ (2) और चार महीने की ‘सनाया’ के साथ कुएं में कूद गई। 

* 22 मार्च को ‘गुडग़ांव’ में 23 वर्षीय महिला ‘काजल’ का शव मिलने के 2 दिन बाद उसके पति ‘अरुण शर्मा’ को दहेज हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया।  ‘अरुण’ पर आरोप है कि उसने ‘काजल’ को दहेज उत्पीडऩ के दौरान कथित तौर पर जहरीला इंजैक्शन दिया था।
दहेज के मामलों में महिलाओं की मौत की घटनाओं को समाज पर गहरा धब्बा बताते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने दहेज से जुड़ी एक मौत के मामले में एक शख्स की जमानत रद्द करते हुए कहा कि कानूनी रोक के बावजूद इस प्रथा के कारण हजारों महिलाएं बेमौत मारी जाती हैं। 

पीठ ने कहा कि दहेज हत्या के एक मामले में पटना हाईकोर्ट का आरोपी को जमानत पर रिहा करने का आदेश टिकाऊ नहीं है। महिला की शादी आरोपी से डेढ़ साल पहले हुई थी। 1 सितम्बर, 2024 को महिला अपने ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई थी। पीठ ने कहा कि दहेज हत्या जैसे बेहद गंभीर अपराध में, उच्च न्यायालय को अपने विवेक का इस्तेमाल करते समय बहुत ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए थी। 

दहेज हत्याओं के मामले में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी समाज के साथ-साथ न्यायिक व्यवस्था को भी संदेश देने वाली है। जिस तरीके से देश में यह सामाजिक बुराई पैर पसार रही है उसे देखते हुए ऐसे मामलों में फास्ट ट्रैक अदालतों के जरिए सुनवाई कर के आरोपियों को सख्त से सख्त सजा दिलाना जरूरी है ताकि इस तरह के मामलों पर लगाम लग सके और बेटियों की जिंदगियां बच सकें।

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