संशोधित महिला आरक्षण विधेयक, नारी शक्ति वंदन अधिनियम, विधेयक 2023 को लागू करने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस अधिनियम में 2029 के आम चुनावों में महिलाओं को विधायिका में 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है। विधेयक में संसद और विधानमंडल में महिला आरक्षण को वर्तमान में चल रही जनगणना और परिसीमन की कवायद से अलग रखना है क्योंकि वर्तमान कानून के अंतर्गत 2029 के लोकसभा चुनावों से पूर्व जनगणना और परिसीमन की पूर्वापेक्षा को पूरा करना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। 

सरकार की योजना है कि विधानसभाओं और लोकसभा की सदस्य संख्या 50 प्रतिशत तक बढ़ाई जाए, जिसके अंतर्गत लोकसभा की वर्तमान 543 सीटें बढ़कर 816 सीटें हो जाएंगी, जिसमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यदि यह विधेयक पारित होता है तो उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर, जिनमें 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं, वे भी विधानसभा में महिला आरक्षण लागू कर सकते हैं। इसके साथ ही विस्तारित सदन में राज्यों का समानुपातिक प्रतिनिधित्व यथावत रहेगा और महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के लिए लॉटरी प्रणाली अपनाई जाएगी। तथापि इसके लिए परिसीमन आयोग के अधिकार क्षेत्र को बदलना होगा जो निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के लिए 2027 की जनगणना नहीं, अपितु 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाएगा क्योंकि 2027 के जनगणना के अंतिम आंकड़ों के आने में विलंब होगा जिसके कारण 2029 में परिसीमन करने के लिए अत्यधिक विलंब हो जाएगा।

वर्तमान में दक्षिणी राज्य इस बात से चिंतित हैं कि वर्तमान जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से लोकसभा में समानुपातिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में उन्हें नुकसान होगा क्योंकि इन राज्यों में उत्तरी और पूर्वी राज्यों की तुलना में जनसंख्या नियंत्रण के उपाय कुशलता से लागू किए गए हैं। दक्षिणी राज्यों की चिंता को दूर करने के लिए प्रत्येक राज्य में सीटों का हिस्सा वर्तमान स्तर पर रखा जाएगा। दक्षिणी राज्यों से लोकसभा के लिए 24 प्रतिशत सदस्य चुन कर आते हैं और इसको लागू करने के लिए सरकार को 2 विधेयक लाने होंगे। पहला, प्रत्येक राज्य के सीटों के हिस्से को अगले 25-30 वर्षों के लिए वर्तमान स्तर पर यथावत रखना और दूसरा, संविधान के अनुच्छेद 82 में संशोधन के लिए विधेयक लाना, जिसमें प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक जनगणना के बाद लोकसभा की सीटों का समायोजन किया जाएगा। इस संदर्भ में गृह मंत्री अमित शाह ने राजग के सहयोगी दलों और विपक्षी दलों तृणमूल और वांमपंथी दलों के साथ पिछले सप्ताह परामर्श किया, जिसमें कांगेस शामिल नहीं थी और प्रस्ताव किया कि विधानमंडलों में लगभग 50 प्रतिशत सीटों को बढ़ा दिया जाए जिससे वर्तमान सांसदों और विधायकों को अपनी सीट बचाए रखने का अवसर मिलेगा, जिनमें से 85 प्रतिशत महिलाएं हैं और साथ ही महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण भी किया जाएगा। 

भाजपा के एक मंत्री के अनुसार महिलाओं की दशा में सुधार के लिए सकारात्मक कदम उठाए जाने की अत्यावश्यकता है क्योंकि पंचायतों के बारे में किए गए अद्यतन अध्ययनों के अनुसार जहां पर महिला आरक्षण लागू है वहां पर महिलाओं की राजनीति में भागीदारी, नेतृत्व, महिला सशक्तिरण और संसाधनों के आबंटन में सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है। हालांकि महाराष्ट्र से बिहार तक अनेक राज्यों में महिलाओं के चुनाव जीतने के बावजूद पुरुष उनके प्रॉक्सी के रूप में कार्य कर रहे हैं। देश की जनसंख्या में महिलाओं की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है और उन्होंने अनेक राज्यों में चुनावों में निर्णायक भूिमका निभाई है तथा बिहार इसका उदाहरण है। इन सीटों पर विपक्ष की बजाय भाजपा को अधिक जीत मिली है। 

वर्तमान में जब हम महिलाओं के सशक्तिकरण करने की बात करते हैं तो हमें कुछ कटु सच्चाइयों को भी देखना होगा। संसद के दोनों सदनों में महिलाओं की संख्या 10 प्रतिशत से कम है। लोकसभा में महिला सदस्यों की संख्या 13.6 प्रतिशत अर्थात 74 सांसद हैं, जो 2019 के 78 सांसदों से कम है। वर्ष 1950 में संसद में महिला सदस्यों की संख्या 5 प्रतिशत थी और 76 वर्षों में उनकी संख्या मे केवल 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह बताता है कि इस दिशा में कितनी धीमी गति से प्रगति हुई है। फलत: उनका कम प्रतिनिधत्व लैंगिक विषमता को दर्शाता है। हैरानी की बात यह है कि त्रिपुरा, अरूणाचल, नागालैंड और जम्मू-कश्मीर से एक भी महिला सांसद नहीं है। राज्य विधानसभाओं में महिलाओ का प्रतिनिधित्व और भी कम है। 2024 के लोकसभा चुनावों में मतदान में महिलाओं ने 65.8 और पुरूषों ने 65 प्रतिशत मतदान किया। 29 राज्यों में से 16 में महिलाओं का मतदान प्रतिशत अधिक रहा, फिर भी महिलाओं को टिकट नही दिए जाते। नि:संदेह राजनीति में मजबूत महिला नेताओं की कमी है। पार्टी के आका अक्सर चुनाव जीतने के लिए उन पर विश्वास नहीं करते, जिसके चलते अधिकतर निर्वाचित निकायों में महिलाओं के मुद्दों की उपेक्षा होती है। 

नि:संदेह पार्टियां इस बात को समझती हैं कि बदलते भारत में महिलाओं की उपेक्षा, उन्हें सत्ता के कोरीडोर और निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर रखना संभव नहीं है, इसलिए राजनीति में महिलाओं की अधिक संख्या से प्रणाली और समाज में सुधार आएगा। इसके अलावा राजनीतिक दल महिला शक्ति का महत्व समझते हैं क्योंकि महिलाओं का मतदान प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र में उनकी छाप बढ़ रही है इसलिए महिला शक्ति ऐसी नीतियों और विधान को सुनिचित करने के लिए आवश्यक है, जो उनके जीवन को प्रभावित करते हैं। महिला केन्द्रित नीतियों से महिला मतदाताओं का राजनीतिक प्रभावीपन बढ़ेगा साथ ही हमें इस बात को भी देखना होगा कि पुरुष-महिला की राजनीति से क्या खतरे पैदा हो सकते हैं। स्पष्ट है कि यदि इस विधेयक को लागू किया जाता है तो यह एक विशिष्ट पूर्वोदाहरण स्थापित करेगा, क्योंकि भारत विश्व का एकमात्र ऐसा बड़ा लोकतांत्रिक देश बनेगा, जहां पर ऐसे सकारात्मक कदमों को लागू किया जाएगा। 

यह विधेयक कोई जादुई छड़ी नहीं है, अपितु महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आशा की जाती है कि यह प्रतिस्पर्धी विवेकहीन लोकप्रियता की कवायद न बने। केवल बातों से काम नहीं चलने वाला, आवश्यकता व्यापक बदलाव की है। नारी शक्ति एक सुखद भविष्य की ओर बढ़ रही है क्योंकि हमारे नेता उन्हें पुरातनपंथी दीवारें तोडऩे में सहायता और उन्हें उचित अवसर दे रहे हैं। समय आ गया है कि हर कोई उनकी आवाज को स्थान देने के लिए आगे आए।– पूनम आई. कौशिश

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