अरावली की पहाड़ियों और सरिस्का वन्यजीव अभयारण्य के बीच स्थित प्रसिद्ध महाभारत कालीन पांडुपोल हनुमान मंदिर में हनुमान जयंती का पर्व हर्षोल्लास और अपार श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस विशेष अवसर पर राजस्थान के कोने-कोने सहित दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से आए हजारों श्रद्धालुओं ने संकटमोचन के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की।

भक्ति और सुगंध से महका मंदिर परिसर

हनुमान जयंती के उपलक्ष्य में मंदिर का स्वरूप अलौकिक नजर आ रहा था। मंदिर प्रबंधन के अनुसार इस बार हनुमान जी की विशेष लेटी हुई प्रतिमा का अद्भुत श्रृंगार किया गया। इस श्रृंगार के लिए विशेष रूप से दिल्ली से गेंदा, गुलाब और मोगरा के ताजे फूल मंगवाए गए थे, जिससे पूरा गर्भगृह महक उठा।

उत्सव की शुरुआत 24 घंटे के अखंड रामायण पाठ से हुई, जिसके समापन के बाद विशेष आरती का आयोजन किया गया। पूरी रात भजन-कीर्तन की सरिता बही, जिसमें गायकों ने हनुमान चालीसा और सुंदरकांड के पाठ से वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया।

श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्थाएं

गर्मी और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर समिति और प्रशासन ने चाक-चौबंद इंतजाम किए थे।
पेयजल एवं ठंडाई: महंत चेतन शर्मा ने बताया कि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए जगह-जगह शीतल जल, मीठे पानी की प्याऊ और ठंडाई की व्यवस्था की गई थी।
भंडारा: मंदिर परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जहां भक्तों ने प्रसादी ग्रहण की।
सजावट: पूरे मंदिर परिसर को रंग-बिरंगे गुब्बारों, रोशनी और आकर्षक फूलों से सजाया गया, जो पर्यटकों और भक्तों के आकर्षण का केंद्र रहा।

आवागमन और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
सरिस्का टाइगर रिजर्व के भीतर स्थित होने के कारण प्रशासन ने प्रवेश द्वारों पर विशेष ध्यान दिया। डीएफओ अभिमन्यु सहारण के निर्देशानुसार:

सदर गेट और टहला गेट: दोनों ही द्वारों को सुबह जल्दी खोल दिया गया था ताकि श्रद्धालुओं को जाम का सामना न करना पड़े। पूर्णिमा और हनुमान जयंती के विशेष अवसर पर निजी वाहनों के साथ-साथ श्रद्धालुओं के आवागमन की सुचारू व्यवस्था की गई।

धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व

    पांडुपोल मंदिर का इतिहास पांडवों के अज्ञातवास काल से जुड़ा है। माना जाता है कि यहाँ भीम का अहंकार चूर करने के लिए हनुमान जी ने वृद्ध वानर का रूप धारण कर अपनी पूंछ रास्ते में फैला दी थी। यहाँ हनुमान जी की लेटी हुई प्रतिमा के दर्शन का विशेष महत्व है, यही कारण है कि साल दर साल यहाँ आने वाले भक्तों की संख्या बढ़ती जा रही है। गुरुवार को मंदिर और सरिस्का की पहाड़ियों में “जय श्री राम” और “बजरंग बली की जय” के जयकारे गूँजते रहे।

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