हर साल 30 मार्च को पूरी दुनिया ‘इंटरनैशनल डे ऑफ जीरो वेस्ट’ मनाती है। 2026 में इसका फोकस भोजन की बर्बादी पर ध्यान आकॢषत करता है। यह सिर्फ एक थीम नहीं, बल्कि एक नैतिक संकट है, जो हमें सबसे दर्दनाक सच्चाई से रूबरू कराता है। जो खाना बर्बाद होता है, उसे किसी किसान ने कड़ी मेहनत से तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए उगाया था। खेत से मंडियों तक उन मजदूरों ने पहुंचाया जिन्हें खुद पेट भर खाने को नहीं मिल रहा। 

यूनाइटेड नेशंस एन्वायरनमैंट प्रोग्राम (यू.एन.ई.पी.) की फूड वेस्ट इंडैक्स रिपोर्ट 2024 बताती है कि दुनिया में 105 करोड़ टन खाना बर्बाद हुआ। इसमें से 60 प्रतिशत बर्बादी घरों और खराब भंडारण व्यवस्था के कारण हुई, 28 प्रतिशत होटल-रैस्टोरैंट सैक्टर में और 12 प्रतिशत रिटेल में। यह सिर्फ लोगों की लापरवाही की समस्या नहीं, यह पूरी व्यवस्था की खामी है, सप्लाई चेन की कमजोरियां, नीतियों की कमी और एक ऐसी सोच, जिसमें खाना फैंक देना सामान्य बात बन गई है।
दूसरी तरफ दुनिया में करीब 78.3 करोड़ लोग आज भी भूख झेल रहे हैं और 30 लाख से ज्यादा लोग संतुलित आहार से वंचित हैं। ऐसे में फसल कटने के बाद होने वाले नुकसान और खाने की बर्बादी को रोकना बेहद जरूरी है। एक तरफ करोड़ों टन अन्न बर्बाद हो रहा है, तो दूसरी ओर करोड़ों लोग भूखे पेट सो रहे हैं, कुपोषण अब भी दुनिया में फैला है। यह विडंबना नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था की असफलता है।

भारत कहां खड़ा है : इस पूरे संकट में भारत की स्थिति गंभीर और असहज करने वाली है। यू.एन.ई.पी.    की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत दुनिया में खाद्यान्न बर्बादी में दूसरे नंबर पर है। हर साल 7.8 से 8 करोड़ टन भोजन व फसल बर्बाद होती है, जिसकी कीमत करीब 1.55 लाख करोड़ रुपए बैठती है। चीन पहले नंबर पर है, जहां 10.80 करोड़ टन खाना बर्बाद होता है। अमरीका में 2.4 करोड़ टन, जर्मनी में  65 लाख टन और जापान में, जहां ‘मोतैनाई’ यानी चीजों को व्यर्थ न जाने देने की संस्कृति है, केवल 52 लाख टन खाना बर्बाद होता है।
भारत में हर व्यक्ति साल में औसतन 55 किलो खाना बर्बाद करता है, जो अमरीका (73 किलो) और जर्मनी (75 किलो) से कम है। लेकिन भारत की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ग्लोबल हंगर इंडैक्स में भारत 125 देशों में 111वें स्थान पर है, करीब 19.4 करोड़ लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता। इसलिए भोजन की बर्बादी सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, यह करोड़ों लोगों के मुंह से छिना हुआ निवाला है।

पंजाब अन्नदाता लेकिन रिसता हुआ भंडार : पंजाब, जो करोड़ों लोगों का पेट भर सकता है लेकिन खेत की उपज का एक बड़ा हिस्सा प्लेट तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाता है। पंजाब में फल और सब्जियों की लगभग 20 प्रतिशत फसल खाने तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती है। वर्ष 2019 से 2024 के बीच अकेले एफ.सी.आई. के गोदामों में ही 8200 टन अनाज खराब हुआ, जो देश में सबसे ज्यादा है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, फसल कटने के बाद की कमजोर व्यवस्था, जैसे ढके हुए गोदामों की कमी, कोल्ड-चेन में निवेश की कमी, मशीनों की समय पर उपलब्धता न होना, ग्रेङ्क्षडग और वैज्ञानिक पैकेजिंग की कमी, ये सब बड़ी बाधाएं पंजाब में हैं।

कीमत धरती चुका रही : भोजन की बर्बादी सिर्फ इंसानी त्रासदी नहीं, यह पर्यावरणीय संकट भी है। दुनिया में कुल ग्रीनहाऊस गैस में से 8 से 10 प्रतिशत भोजन की बर्बादी से पैदा हो रही हैं। जब खाना कचरे में सड़ता है तो इससे निकलने वाली मीथेन गैस, कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना ज्यादा खतरनाक है। हर दाना बर्बाद होने का मतलब है पानी, जमीन, ईंधन, खाद, बीज, कीटनाशक और किसान की मेहनत का नुकसान। एक किलो चावल उगाने में करीब 5000 लीटर पानी लगता है। जब वह चावल फैंका जाता है, तो वह पानी भी बर्बाद होता है, खासकर पंजाब जैसे राज्य में, जहां भूजल तेजी से गिर रहा है। समय की मांग है कि खाद्यान्न की बर्बादी को जलवायु नीति में शामिल किया जाए।

आगे की राह : खाद्यान्न नुकसान को कम करना सिर्फ फसल या बचे हुए खाने को संभालना नहीं, यह सोच बदलने की जरूरत है कि हम खाने को कैसे देखते हैं, कैसे सहेजते हैं और कैसे इस्तेमाल करते हैं। बर्बादी कम करने के लिए हमें पूरी व्यवस्था, प्रोत्साहन और सोच बदलनी होगी और इसमें किसान की गरिमा को ध्यान में रखना चाहिए। इसके लिए पांच व्यावहारिक कदम जरूरी हैं : 
1. कोल्ड-चेन बनाओ, नुकसान की चेन तोड़ो :भारत अपनी कुल उपज का सिर्फ 8 प्रतिशत प्रोसैस करता है, जबकि अमरीका 65 प्रतिशत व चीन 23 प्रतिशत। कोल्ड-चेन व प्रोसैसिंग को फूड सिक्योरिटी का हिस्सा माना जाए।
2. बर्बादी रोकने के लिए बने कानून : यूरोप के कई देशों में सुपरमार्कीटों के लिए खाना फैंकना गैरकानूनी है, उन्हें फूड बैंक को दान करना होता है। भारत में भी ऐसा कानून होना चाहिए और दान करने वालों को टैक्स में छूट दी जा सकती है।
3. किसान को मजबूत बनाओ : भोजन का नुकसान खेत से ही शुरू होता है। किसान उत्पादक संगठनों को मशीनें, आधुनिक स्टोरेज और मोबाइल कोल्ड यूनिट्स दी जानी चाहिएं। जूट बैग में अनाज रखने की पुरानी व्यवस्था को बदलकर आधुनिक तकनीक अपनानी चाहिए।
4. बर्बादी बताओ : भारत में अभी भोजन बर्बादी का कोई मानिटरिंग सिस्टम नहीं है। बड़े होटल, शादी-ब्याह कैटरिंग और संस्थानों में बर्बादी का रिकॉर्ड रखना और इसे सार्वजनिक करना जरूरी किया जाए।
5. ‘अन्न’ का सम्मान करें : हमारी संस्कृति में अन्न को भगवान माना गया है-‘अन्न ही ब्रह्म है।’ यह सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि सबसे टिकाऊ सोच है। स्कूलों, समाज और संस्थानों में इस भावना को जिम्मेदारी के रूप में जीवित करना होगा। समय की मांग है कि भोजन की बर्बादी रोकना राष्ट्रीय प्राथमिकता बने। -डा. अमृत सागर मित्तल 

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