अमरीका-ईरान में युद्धविराम ‘वेंटिलेटर’ पर है। जिंदा है, सांस चल रही है, लेकिन कभी भी दम तोड़ सकता है। यह युद्धविराम के मात्र दो दिन का सारांश है। यदि इन दोनों देशों के बीच शांति-समझौता नहीं हो पाया अथवा युद्धविराम ‘ईमानदार’ ही नहीं रहा, तो उसके बाद ‘महाविनाश का युद्ध’ लगभग तय मानना चाहिए, क्योंकि अमरीका के विराट युद्धपोत, लड़ाकू विमान, मिसाइलें, ड्रोन समेत सैनिक मध्य-पूर्व में ही मौजूद हैं। युद्धविराम के कुछ ही घंटों में इजरायल ने लेबनान के कुछ शहरों में, 10 मिनट के अंतराल में ही, करीब 160 बम बरसाए, नतीजतन 303 से अधिक मासूम, बेगुनाह लोग मारे गए और 1500 से अधिक घायल हुए। इनके अलावा, बहुमंजिला इमारतें ध्वस्त कर दी गईं। यह सरकारी डाटा है। लेबनान की सडक़ों पर हृदयविदारक चीख-पुकार ने मन के भीतर बार-बार सवाल पैदा किए कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू ‘सामूहिक नरसंहार’ पर आमादा क्यों हैं? क्या वह मनुष्य नहीं हैं? अथवा एक राक्षस ने मनुष्य का मुखौटा पहन रखा है? यदि ऐसे नरसंहारों के प्रभाव में नेतन्याहू चुनाव जीत कर फिर प्रधानमंत्री बन जाते हैं, तो मानवता उस पर थूकती है। वक्त इस हत्यारे का भी आएगा, जब लाश बनने में कुछ पल ही लगेंगे! इजरायल भारत का मित्र-देश है, लेकिन भारत नरसंहारों को कभी भी समर्थन नहीं देता। सवाल यह नहीं है कि युद्धविराम की परिधि में लेबनान है या नहीं है।

चिंता और सरोकार यह है कि इस नरसंहार के बाद युद्धविराम ‘वेंटिलेटर’ पर पहुंच गया है। ईरान तिलमिला उठा है। ईरानी संसद के स्पीकर कालीबाफ का मानना है कि युद्धविराम के 10 सूत्रों में से 3 सूत्रों का घोर उल्लंघन हुआ है, लिहाजा किसी शांति-वार्ता या समझौते का कोई मतलब नहीं रहा है। ईरान का आरोप है कि अमरीका इजरायल के जरिए जंग में है और जंगबंदी का ऐलान किया गया है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, खासकर यूरेनियम के संवर्धन और अंतत: परमाणु शक्ति सम्पन्न देश बनने के सबसे अहम मुद्दे पर अमरीका-ईरान के दरमियान विरोधाभास पूर्ववत हैं। ईरान परमाणु कार्यक्रम को अपना संप्रभु अधिकार मानता है, जबकि अमरीका उसका संवर्धित यूरेनियम नष्ट कर देना अथवा उसे अपने देश ले जाने पर आमादा है। क्या यही युद्धविराम की आधार-स्थिति है? क्या राष्ट्रपति टं्रप दुनिया के ‘लठैत चौधरी’ हैं? इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग इतनी देर ही खुल पाया कि तेल-गैस का एक ही टैंकर गुजर पाया। ईरान ने लेबनान नरसंहार के बाद होर्मुज को फिर बंद कर दिया है और युद्धविराम से बाहर आने के संकेत भी दिए हैं। ईरान युद्ध के 40 दिनों में वैश्विक स्तर पर 590 अरब डॉलर (करीब 49 लाख करोड़ रुपए) का नुकसान आंका गया है। ईरान के 13 लाख करोड़ रुपए बर्बाद हो चुके हैं। ईरान के पुनर्निर्माण में 10 साल से अधिक का समय लगेगा। वहां करीब 120 फीसदी मुद्रास्फीति है और करीब 4 करोड़ लोग गरीबी-रेखा के नीचे जा सकते हैं। ईरान की जीडीपी में करीब 20 फीसदी तक गिरावट संभव है और तेल-निर्यात अवरुद्ध होने से उसे 33,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। ऊर्जा की कीमतों में उछाल से 30 से अधिक बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश भी दबाव में हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी की चेतावनी है कि युद्ध के कारण विश्व में ऊर्जा ही नहीं, खाद्य संकट भी गहरा सकता है। भारत को भी ईरान युद्ध के चौतरफा नुकसान झेलने पड़े हैं।

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