पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में ऐसा हिंसक उत्पात मचाया गया कि देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की नींद ही उड़ गई। वह आधी रात के बाद 2 बजे तक जागते रहे और प्रयास करते रहे कि ‘बंधक’ बनाए गए 7 न्यायिक अधिकारी सुरक्षित मुक्त हो जाएं। उन अधिकारियों में 3 महिलाएं भी थीं। प्रधान न्यायाधीश ने कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को फोन किए। मुख्य न्यायाधीश ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक को फोन कर ‘बंधक’ अधिकारियों को मुक्त कराने का आग्रह किया। उन्हें ‘आश्वस्त’ किया गया, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। देश के प्रधान न्यायाधीश का कहना है कि रात के 11 बजे तक मालदा के डीएम और एसएसपी घटनास्थल पर नहीं पहुंचे थे। अधिकारियों को अपराह्न 3.30 बजे के करीब बंधक बनाया गया था। उन 8-9 घंटों के अंतराल में कोई भी अनहोनी हो सकती थी! हजारों की भीड़ उस दफ्तर के बाहर बेहद उत्तेजित और आक्रोशित थी। उनके हाथों में लाठियां, डंडे, पत्थर थे। भीड़ ने कारें तोड़ीं, उनमें आग लगाई और पथराव किए। कमोबेश यह लोकतंत्र की अभिव्यक्ति नहीं थी। यह गुंडागर्दी ही नहीं, खतरनाक जंगलराज का मंजर था। अंतत: जस्टिस सूर्यकांत को मौखिक आदेश देना पड़ा और सुरक्षा बलों ने उन न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षित मुक्त कराया। सर्वोच्च अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, कानून-व्यवस्था के पुलिस प्रमुख, क्षेत्र के पुलिस आयुक्त और जिले के डीएम, एसएसपी को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर 6 अप्रैल को अदालत में ऑनलाइन पेश होने के आदेश दिए हैं। हम इसे पर्याप्त नहीं मानते। संभव है कि कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया ऐसे ही चलती होगी, लेकिन भीड़ ने न्यायिक अधिकारियों पर जिस तरह हमला किया और उन्हें करीब 9 घंटे तक ‘बंधक’ बनाए रखा, कमोबेश यह लोकतांत्रिक कलंक है, न्याय और कानून-व्यवस्था का हमलावर उल्लंघन है और लोकसेवकों के काम में आपराधिक अड़चन है। प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने भी माना है कि यह कोई सामान्य घटना नहीं, साजिश और आपराधिक अवमानना है। हर कोई राजनीतिक भाषा बोल रहा है।

दरअसल यह न्यायिक अधिकारियों पर मनोवैज्ञानिक हमला है। अब सवाल यह है कि क्या यह उन लोगों की आक्रामक प्रतिक्रिया, गुस्सा, आक्रोश है, जिनके मताधिकार छीन लिए गए? किन्हीं भी कारणों से उनके नाम मतदाता सूची से काट दिए गए? लिहाजा यह घटना उत्पात, हुड़दंग, हिंसा के अलावा, चुनाव आयोग के लिए एक गंभीर चुनौती भी है। आयोग को विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर तटस्थ और गैर-राजनीतिक तौर से पुनर्विचार करना चाहिए। संविधान ने चुनाव आयोग को शक्तियां दी हैं, तो देश के नागरिकों को भी मौलिक अधिकार दिए हैं। बंगाल में 50 लाख से अधिक मतदाताओं को ‘तार्किक विसंगति श्रेणी’ में रखा गया था। उनमें से करीब 13 लाख मतदाताओं पर अभी अंतिम निर्णय लिया जाना है। सर्वोच्च अदालत के आदेश पर न्यायिक अधिकारी उसी जांच में जुटे रहे हैं। मुस्लिम बहुल मालदा जिले में 8,67,054 मतदाता अभी विचाराधीन हैं। जहां यह घटना हुई, वहां ही करीब 78,000 मतदाताओं पर निर्णय होना है कि वे 23 और 29 अप्रैल को वोट दे सकेंगे या नहीं! मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने दायित्व से पल्ला झाड़ लिया है। उन्होंने तंज कसा है कि चुनाव आयोग ‘सुपर राष्ट्रपति’ की तरह काम कर रहा है। बेशक चुनाव के दौरान प्रशासन चुनाव आयोग के प्रति जवाबदेह होता है। आयोग ने बंगाल में 474 अधिकारियों को बदला है, लेकिन लगता है कि नए प्रशासनिक अधिकारी भी ‘ममतामय’ हैं। बहरहाल, सवाल है कि क्या मतदान और पूरा चुनाव निष्पक्ष, तटस्थ हो सकेगा? सभी अधिकारियों को निष्पक्ष होकर काम करना चाहिए।

Advertisement Carousel
Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
April 2026
M T W T F S S
 12345
6789101112
13141516171819
20212223242526
27282930