अमरीका-ईरान की शांति-वार्ता नाकाम और बेनतीजा रही। यही इसकी नियति थी। हालांकि बेहद महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रयास किया गया था कि दोनों दुश्मन देशों के प्रतिनिधि आमने-सामने बैठे, तीन चरण की बातचीत 21 घंटे चली, लेकिन जिद और अमरीका की ‘लठैतबाजी’ के कारण वार्ता विफल रही। सितंबर, 2013 के बाद यह दूसरा मौका था, जब अमरीका और ईरान के प्रतिनिधि आमने-सामने बैठे और संवाद किया। तब अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी को आमंत्रित किया था। तब भी बुनियादी मुद्दा परमाणु कार्यक्रम का था। तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री जॉन कैरी और ईरानी समकक्ष मुहम्मद जावेद जरीफ के दरमियान बातचीत हुई थी, नतीजतन 2015 में ‘परमाणु करार’ हुआ था। बेशक बाद में उसे रद्द कर दिया गया। इस बार अमरीका यह चाहता था कि ईरान का करीब 450 किग्रा. सवंर्धित यूरेनियम नष्ट किया जाए अथवा अमरीका को अपने देश ले जाने दिया जाए। इस पर समझौता कैसे संभव था? ईरान ने परमाणु कार्यक्रम छोडऩे से ही साफ इंकार कर दिया। हालांकि परमाणु बम बनाने की रणनीति अभी स्पष्ट नहीं है। अलबत्ता रूस का दावा है कि ईरान परमाणु हथियार बना चुका है। यह बेहद खौफनाक और विध्वंसकारी खबर है, लेकिन हमें ईरान और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की घोषणा का इंतजार करना चाहिए। अमरीकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने परमाणु मुद्दे पर ईरान के अड़े रहने पर ही शांति-वार्ता की नाकामी की घोषणा की और प्रतिनिधिमंडल समेत सुबह 7.35 बजे ही वॉशिंगटन लौट गए। ईरान पक्ष का दावा है कि 2-3 मुद्दों पर सहमति बन चुकी थी। अमरीका को बातचीत से निकलने और दोबारा युद्ध छेडऩे का बहाना चाहिए था, लिहाजा उसने वार्ता को विफल करार दे दिया। ईरान ने यह भी स्पष्ट किया कि निकट भविष्य में फिर वार्ता शुरू करने की कोई योजना नहीं है।

अब गेंद अमरीका के पाले में है। ईरान ने यह भी कहा कि होर्मुज पर पेंच फंसा रहा। वहां अब भी ईरान का नियंत्रण रहेगा और अमरीका-इजरायल के जहाज वहां से गुजर नहीं पाएंगे। ईरान की फ्रीज संपत्तियों और पाबंदियों पर अमरीका ने कोई बातचीत ही नहीं की। गौरतलब है कि अमरीका ने ईरान पर 711 पाबंदियां थोप रखी हैं और ईरान की 11 लाख करोड़ रुपए की संपत्तियां अमरीका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ ने जब्त कर रखी हैं। एक बयान यह भी है कि ईरान 93 लाख करोड़ रुपए की संपत्तियों को जारी करने की मांग कर रहा है। उसकी अरबों की संपत्तियां जापान और चीन की जब्ती में भी हैं। दरअसल गंभीर और मौजू सवाल यह है कि क्या अमरीका ईरान पर नए सिरे से युद्ध थोपेगा? राष्ट्रपति टं्रप जानते हैं कि अमरीका में ही उनकी लोकप्रियता काफी नीचे आ गई है। सीनेट और कांग्रेस (संसद) के 67 सांसदों ने मांग की है कि राष्ट्रपति टं्रप को पद से हटाया जाए। यह मांग महाभियोग में तबदील हो सकती है। अमरीका में ही पेट्रोल आदि के दाम 35 फीसदी बढ़ गए हैं, जो अभूतपूर्व हैं। क्या राष्ट्रपति टं्रप के पास युद्ध का ही विकल्प शेष है? होर्मुज अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग है। उसके बंद रहने से 1.5 करोड़ बैरल तेल हररोज आवाजाही नहीं कर पाता है। करीब 9 करोड़ टन सालाना कतर और संयुक्त अरब अमीरात की एलएनजी का निर्यात इसी रास्ते से होता था, वह भी प्रभावित है। युद्ध के कारण इन देशों ने उत्पादन ही लगभग बंद कर दिया है, क्योंकि ईरान के मिसाइल-ड्रोन हमलों में एलएनजी के संयंत्रों की भारी तबाही हुई है। भारत के भी 14-15 जहाज, टैंकर अभी होर्मुज पर फंसे हैं। भारत में गैस का ऐसा संकट है कि लोग फिर से कोयले की अंगीठी या मिट्टी के तेल के स्टोव पर आ रहे हैं। बाजार में उनके दाम भी कई गुना कर दिए गए हैं। होर्मुज बंद रहेगा, तो भारत कब तक ऊर्जा-संकट, गैस-संकट और खाद्य-संकट को टाल सकता है? क्या अमरीका को यूरेनियम ही दिखाई देता है? युद्ध के कारण जो 30 लाख ईरानी विस्थापित हो गए, करीब 1 लाख रिहायशी घर ध्वस्त हो गए, ईरान कब्रिस्तान-सा बन गया, करीब 140-145 अरब डॉलर का नुकसान हो चुका है, क्या टं्रप को उनकी चिंता नहीं है?

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