प्रधानमंत्री मोदी के अंधभक्त गणों के लिए एक ‘बैड न्यूज’ है। ‘टाइम’ मैगजीन ने साल २०२६ की दुनिया के प्रभावशाली लोगों की सूची घोषित की। उसमें प्रधानमंत्री मोदी का नाम कहीं भी दिखाई नहीं देता। अभिनेता रणबीर कपूर, इंटरनेशनल ‘बावर्ची’ विकास खन्ना इस प्रभावशाली लोगों की सूची में हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में टाइम की ‘पावर’ लिस्ट में चमके हैं, लेकिन विश्वगुरु की हवा इस बार पूरी तरह निकली हुई दिखती है। सूची में डोनाल्ड ट्रंप, चीन के शी जिनपिंग, इजरायल के बेंजामिन नेतन्याहू हैं। नेपाल, बांग्लादेश में राजनीतिक क्रांति लानेवाले दो युवा नेता हैं। बेशक अंधभक्त कहेंगे, मोदी का नाम नहीं आया तो इसमें क्या बड़ी बात है। टाइम की पावर लिस्ट पर दुनिया नहीं चलती। उनका यह कहना सच ही है, लेकिन इससे पहले मोदी ने २०१४ से २०२१ तक पांच बार ‘टाइम १००’ में दुनिया के प्रभावशाली नेता के रूप में स्थान प्राप्त किया था, तब अंधभक्त महामंडल ने भारत में विश्वगुरु का उत्सव मनाया था। इसलिए नेपाल, बांग्लादेश के प्रधानमंत्रियों जितनी भी साख मोदी की इस बार नहीं रही क्या, ऐसा प्रश्न खड़ा हो सकता है। २४ घंटे पहले ही प्रेसिडेंट ट्रंप द्वारा मोदी को फोन करके चर्चा करने की जानकारी खुद मोदी ने ही दी, लेकिन अगले १२ घंटों में भारत रूस से तेल खरीदना बंद करे ऐसा फरमान अमेरिका से छूटा और भारत ने उसे मान लिया। यह कोई क्रांतिकारी नेतृत्व के लक्षण नहीं हैं। एक समय ऐसा था कि ऊग्स मैगजीन का कवर उनके नाम से सजता था। तब ट्रंप, पुतिन से भी अपनी ही ‘पावर’ ज्यादा है, ऐसे अंदाज में मोदी विश्व भ्रमण पर निकलते थे। अब मोदी सौ प्रभावशाली लोगों में नहीं होंगे इसका अर्थ है कि वे
वैश्विक राजनीति में कमजोर
हो रहे हैं। यह उनकी ढही हुई भूमिकाओं का प्रतिबिंब है। भारत की अर्थव्यवस्था गिरकर छठे स्थान पर चली गई। रुपया डॉलर के मुकाबले ९४-९५ तक गिर गया। मोदी के विदेशी रिश्ते -नाते केवल फोटो, सोशल मीडिया और सभाओं के भाषणों तक सीमित रह गए। ईरान-इजरायल, अमेरिका के युद्ध में कंगाल पाकिस्तान को बहुत ज्यादा महत्व मिला। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल मुनीर शांति चर्चा के लिए तेहरान उतरे। इस्लामाबाद में शांति वार्ता हुई, लेकिन इन सब गतिविधियों में भारत कहीं नहीं दिखा। मोदी कभी भी बहुत बड़े वैश्विक राजनयिक नहीं थे। अमेरिका में ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने पर भारत पर ‘टैरिफ’ का हथौड़ा चला। चीन के साथ हमारे संबंध आज भी तनावपूर्ण ही रहे। क्वॉड और ब्रिक्स में भी भारत की भूमिका का वैसा महत्व नहीं बचा है। क्योंकि ऐसे वैश्विक समारोहों में मोदी ‘बैलेंसिंग एक्ट’ कहते हुए मदारी का खेल करते दिखते हैं। कोई भी स्टैंड नहीं लेते। वे एक व्यापारी की तरह व्यवहार करते हैं और भारत के अपने उद्योगपति मित्रों को वैश्विक मंच पर फायदा मिले, बस इतना ही देखते हैं। जब पश्चिमी देश, पाकिस्तान, श्रीलंका जैसे पड़ोसी राष्ट्र इजरायल-ईरान संघर्ष में भूमिका निभा रहे थे, तब मोदी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में प्रचार का डमरू बजाते घूम रहे थे। ‘सबका साथ, सबका विकास’ की मोदी की थ्योरी वैश्विक राजनीति में फेल साबित हुई। ऊग्स १०० जैसी सूची से मोदी का गायब होना कोई संयोग नहीं है। दुनिया अब मोदी को भाव नहीं देती। मोदी के पास कोई विजन नहीं है। घरेलू राजनीति में कई चालबाजियां करके
सत्ता से चिपके हुए नेता
के रूप में उनकी ओर देखा जाता है। मोदी के काल में देश धर्मांधता और कट्टरवाद की ओर झुका। लोकतांत्रिक संस्थाओं का पतन हुआ। उनका हिंदुत्व का ढोंगी एजेंडा मानवाधिकारों के लिए घातक होने की चर्चा दुनिया में है। पत्रकारिता और न्यायालयों पर दबाव है और अल्पसंख्यक दहशत में हैं। यह सब पश्चिमी मीडिया और थिंक टैंक में भारत को ‘इलेक्टोरल-ऑटोक्रसी’ के रूप में चित्रित करते हैं। भारत में मोदी का एकाधिकार चल रहा है। उस दृष्टि से वे शक्तिशाली हैं। देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन व्यक्ति का शक्तिशाली होना इसमें आश्चर्य क्या है! कभी देवगौड़ा भी प्रधानमंत्री के रूप में प्रभावशाली थे ही। इसलिए मोदी भारत में प्रभावशाली हैं, इसमें वैâसी प्रशंसा! मोदी की घर की लोकप्रियता में गिरावट आने के कारण ही उनकी वैश्विक लोकप्रियता को ग्रहण लगा है। मोदी की नीतियां झूठी साबित हुर्इं। ‘वोकल फॉर लोकल’ के नाम पर अर्थव्यवस्था मजबूत करने के बजाय भारत वैश्विक व्यापार युद्ध में फंस गया। पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध पूरी तरह बिगड़ चुके हैं। अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, महंगाई ये मसले देश में सुलग रहे हैं। हर चीज में भारत-पाकिस्तान, हिंदू-मुसलमान करके लोगों को तनाव में रखना, इससे दुनिया में प्रतिष्ठा मिलती है, इस भ्रम से मोदी को बाहर निकलना चाहिए। देश के युवा नेतृत्व और विपक्षी दलों को खत्म करके खुद को मजबूत साबित करने का दांव उन पर ही उल्टा पड़ गया है। ‘मोदी मैजिक’ महज एक हाथ की सफाई थी। मोदी ने वैश्विक मंच पर क्या विशेष उपलब्धि हासिल की? अगर किसी के पास कोई लेखा-जोखा हो तो दें। ऊग्स १०० से भारत के प्रधानमंत्री का गायब होना मोदी के पतन की शुरुआत है। दुनिया को जो समझ आया, वह देश को कब समझ आएगा?

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