यदि अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप के भीतर कोई ‘इनसान’ मौजूद है, तो उसे उत्प्रेरक की भूमिका अदा करनी चाहिए और टं्रप के मानस में इनसानियत के प्रति सोचने का एहसास पैदा करना चाहिए। ईरान युद्ध अब बिल्कुल खत्म होना चाहिए। बहुत विनाश और विध्वंस हो चुका है। बेशक ईरान सार्वजनिक तौर पर कबूल न करे, लेकिन वह कब्रिस्तान-सा हो चुका है। घोर आर्थिक संकट की स्थिति है। दूसरी तरफ अमरीकी कांग्रेस (संसद) का एक मजबूत पक्ष और अमरीका की ही बहुतायत जनता राष्ट्रपति टं्रप पर युद्ध खत्म करने का चौतरफा दबाव डाल रहे हैं। ईरान का परिष्कृत यूरेनियम कब्जाने की नाकामी के कारण दुनिया को ‘फिरौती’ के लिए विवश नहीं किया जा सकता। गौरतलब यह है कि बीते साल वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास-दर 3.4 फीसदी थी। टं्रप के टैरिफवाद के बावजूद यह बढ़ोतरी साधारण थी। जनवरी में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने आकलन दिया था कि 2026 में भी कमोबेश विकास-दर 3.4 फीसदी ही रहेगी। अब उसने अपना आकलन संशोधित कर कहा है कि अर्थव्यवस्था घट कर 3.1 फीसदी हो सकती है, लेकिन आईएमएफ के ही मुख्य अर्थशास्त्री का आकलन 2.5 फीसदी तक लुढक़ने का है। आखिर यह गिरावट क्यों है? क्योंकि ईरान युद्ध बुनियादी तौर पर अब भी जारी है और होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग की तालाबंदी, नाकाबंदी की गई है। नतीजतन सैकड़ों देशों के तेल-गैस, खाद, अन्य उपयोगी सामानों की आवाजाही ठप है। होर्मुज बंद होने के कारण और तेल-गैस ठिकानों के, ईरानी हमलों में, क्षतिग्रस्त होने के कारण खाड़ी देशों ने उत्पादन ही कम कर दिया है। एक अनुमान है कि 50 करोड़ बैरल तेल का उत्पादन कम किया गया है, जिसकी कीमत 50 अरब डॉलर बताई जा रही है। कोई भी देश एलएनजी होर्मुज के पार नहीं भेज पा रहा है, नतीजतन उर्वरक, अल्युमीनियम, हीलियम, सल्फर आदि की घोर कमी सामने आई है।
खाद 300 डॉलर प्रति टन महंगी हो गई है। तांबा और निकल (सफेद चांदी जैसी धातु) के उत्पादन भी प्रभावित हुए हैं। निकल का इस्तेमाल स्टेनलेस स्टील और सिक्के बनाने में होता है। बहरहाल यदि जंग जारी रही, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास-दर मात्र 2 फीसदी हो सकती है। यदि राष्ट्रपति टं्रप के भीतर दुनिया के प्रति चिंताएं और सरोकार हैं, तो उन्हें ईरान के साथ सार्थक, ईमानदाराना बातचीत करनी चाहिए। अपने प्रतिनिधिमंडल को ऐसे ही निर्देश देने चाहिए, जिससे समझौता हो सके। टं्रप को बार-बार ईरान के सभी बिजली संयंत्र, पुल, रेल नेटवर्क को तबाह, बर्बाद करने के बयानों से बचना चाहिए। राष्ट्रपति स्तर का कोई भी व्यक्ति ऐसी भाषा नहीं बोलता। यह साम्राज्यवाद की भाषा है। टं्रप को शेष दुनिया के विशेषज्ञ और नेतागण ‘सनकी’, ‘मानसिक विक्षिप्त’, ‘बेवकूफ’ मान रहे हैं, तो उसकी बुनियादी वजह यही है कि वह दुनिया को अपना ‘गुलाम’ बना लेना चाहते हैं। अमरीका और इजरायल ईरान के करीब 90,000 घर मिट्टी-मलबा कर चुके हैं। सैकड़ों अस्पताल और स्कूल जमींदोज कर दिए गए हैं। इजरायल का प्रधानमंत्री तो ‘आदमहंता’ है। न जाने विनाश और विध्वंस में उसे क्या सुकून मिलता है या कौनसी सुरक्षा निहित है! ईरान कुल 25 लाख करोड़ रुपए का नुकसान आंक रहा है, लिहाजा अमरीका समेत सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर आदि खाड़ी देशों से भी ईरान मुआवजा मांग रहा है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की रपट है कि ईरान युद्ध से करीब 25 लाख लोग गरीबी की चपेट में आ चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 51 दिन के बाद अब भी युद्ध समाप्त कर दिया जाए, तो भी तेल-गैस के दाम 2030 से पहले सामान्य स्तर पर लौटना मुश्किल हैं। होर्मुज के सामान्य होने में ही तीन माह लगेंगे। वहां अब भी 128 टैंकर फंसे हैं, जिनमें 16 करोड़ बैरल तेल है। भारत के भी 13-14 जहाज, टैंकर होर्मुज में फंसे हैं। दो जहाजों पर तो गोलीबारी भी हो चुकी है। युद्ध से चौतरफा संकट पैदा हुए हैं। विश्व इतिहास का सबसे घोर ऊर्जा-संकट झेल रहा है। ऐसे में राष्ट्रपति टं्रप चाहें, तो जंग खत्म हो सकती है।



















