ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस में बगावत हो गई है, लिहाजा पार्टी में टूट के पुख्ता आसार हैं। ममता ने मंगलवार को जहां ‘प्रतीकात्मक धरना’ दिया था, वहां तृणमूल के 80 नवनिर्वाचित विधायकों में से सिर्फ 7 ही पहुंचे। शेष 73 विधायक कहां थे? धरने से एक दिन पहले ममता बनर्जी ने विधायकों की बैठक बुलाई थी, लेकिन उसमें भी 20 विधायक ही पहुंचे। शेष 60 विधायक तब भी गायब थे, नतीजतन बैठक रद्द करनी पड़ी। धरने के वक्त समर्थकों की जो संख्या दिख रही थी, उससे ममता और तृणमूल के प्रति मोहभंग और अस्वीकार्यता स्पष्ट होती है। संसद के दोनों सदनों में तृणमूल कांग्रेस के 42 सांसद हैं, 80 विधायक हालिया चुनाव में जीत कर आए हैं और करारी पराजय के बावजूद 40 फीसदी से अधिक वोट तृणमूल को मिले हैं। इसके मद्देनजर पार्टी के अस्तित्व और समग्र स्वीकृति सरीखे सवाल नहीं उठाए जा सकते। सवाल यह मौजू है कि क्या तृणमूल कांग्रेस की नियति भी शिवसेना और एनसीपी जैसी हो सकती है? आज ‘असली शिवसेना’ महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के पास है। जिस एनसीपी को शरद पवार ने गठित किया था, सालों तक सींचा भी था, आज वह पार्टी उन्हीं की घरेलू बहू सुनेत्रा पवार (दिवंगत अजित पवार की पत्नी) के कब्जे में है। अजित शरद पवार के सगे भतीजे थे और वह ही अजित की राजनीति के ‘चाणक्य’ थे। अजित ने भाजपा से गठबंधन कर लिया और ‘महायुति’ की सरकार में उपमुख्यमंत्री बन गए। एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। अब उनकी पत्नी सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं और एनसीपी की प्रमुख भी हैं। हालांकि दोनों मामले शीर्ष अदालत के विचाराधीन हैं। ममता बनर्जी ने दो बागी विधायकों-ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा-को पार्टी से निष्कासित कर दिया है। उसके बाद पार्टी के भीतर विद्रोह और असंतोष गहरा गए हैं। चुनाव तक तृणमूल के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे रिजु दत्ता यहां तक दावा कर रहे हैं कि 80 में से 50 से अधिक विधायक टूटने नहीं, बल्कि पार्टी पर आधिपत्य और असलीपन का दावा ठोंकने पर आमादा हैं। ऐसे नेताओं की शिकायत है कि अब पार्टी में कोई भी नेतृत्व नहीं रहा। आई-पैक कंपनी पार्टी को धकिया रही है। ये नाराज विधायक स्पीकर (विधानसभा अध्यक्ष) से मिल कर साबित कर सकते हैं कि 65-70 फीसदी विधायक एकजुट हैं और ममता से अलग हैं, लिहाजा वे ही ‘असली तृणमूल’ हैं। उन्हें ऐसी मान्यता दी जाए।

दावे तो यहां तक किए जा रहे हैं कि तृणमूल के 28 लोकसभा सांसदों में से अधिकतर पाला बदलने को तैयार हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अभी तक स्वीकृति नहीं दी है। हालांकि असंतुष्ट सांसदों को संकेत दिए गए हैं कि वे दो-तिहाई सांसदों का एक नया गुट तैयार करें, एक प्रस्ताव पर अधिकृत हस्ताक्षर कराएं और लोकसभा स्पीकर को दें। स्पीकर ही अंतिम निर्णय लेंगे। भाजपा उस गुट को समर्थन दे सकती है। प्रधानमंत्री के निर्देशानुसार भाजपा को अभी दलबदल के लिए ‘लालायित’ नहीं होना चाहिए, क्योंकि बंगाल में ऐतिहासिक और प्रचंड जनादेश मिला है। बहरहाल बंगाल में तृणमूल के विधायकों में ‘नेता प्रतिपक्ष’ को लेकर घमासान मचा है, लिहाजा कुछ विधायकों ने स्पीकर से शिकायत की है कि नेता प्रतिपक्ष के लिए जिस शोभनदेव चट्टोपाध्याय का नाम भेजा गया होगा, उस प्रस्ताव पर उनके ‘फर्जी हस्ताक्षर’ किए गए हैं। सीआईडी इसकी जांच कर रही है और सांसद अभिषेक बनर्जी को भी 8 जून की पेशी का नोटिस भेजा गया है। बहरहाल गंभीर सवाल यह है कि क्या एक चुनाव हारने पर ही पार्टी में इस कदर बगावत हो सकती है कि दोफाड़ की नौबत आ जाए? वैसे ममता बनर्जी से तृणमूल कांग्रेस छीनना इतना आसान नहीं है। सांसद-विधायक की बात छोडि़ए, चुनाव आयोग कई स्तरों पर आकलन करता है कि पार्टी में बहुमत का नेतृत्व किसके पक्ष में है? राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों की राय ली जाती है। जिला-प्रदेश इकाइयों के बहुमत भी देखे जाते हैं। दरअसल उन दलों के भीतर ऐसे हालात और विभाजन पैदा होते हैं, जो किसी निश्चित विचारधारा पर आधारित नहीं होते। लिहाजा भाजपा और वामदलों में इतनी व्यापक टूट कभी नहीं हुई, क्योंकि दोनों ही काडर आधारित दल हैं। बहरहाल पूर्व मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के लिए अत्यंत गंभीर राजनीतिक चुनौती है कि वह अपनी पार्टी को कैसे बांध कर रख पाती हैं?

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