युद्धविराम की अवधि समाप्त होने से करीब अढाई घंटे पहले राष्ट्रपति टं्रप ने ‘बेमियादी युद्धविराम’ की घोषणा कर दी। जब तक अमरीका और ईरान के बीच बातचीत नहीं होती, तब तक युद्धविराम जारी रहेगा। दूसरी तरफ, ईरान अपनी मांग और शर्त पर अड़ा है कि जब तक होर्मुज और ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी खत्म नहीं की जाती, तब तक कोई वार्ता नहीं होगी। ईरान ने ‘डाकिए’ पाकिस्तान की दोगली भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। बल्कि अब ईरान को भरोसा नहीं है कि पाकिस्तान तटस्थ संदेशवाहक की भूमिका भी निभा सकता है। अमरीकी खुफिया एजेंसी ने भी रपट दी है कि पाकिस्तान का फील्ड मार्शल जनरल मुनीर अमरीका के साथ विश्वासघात साबित हो सकता है। वह मार दिए गए ईरानी जनरल सुलेमानी के बहुत करीब था और आज भी आईआरजीसी के कमांडरों से उसके अच्छे संबंध हैं। बहरहाल अब अमरीकी राष्ट्रपति की जुबानी भाषा काफी बदल चुकी है। अब वह ईरान को ‘पाषाण-युग’ में भेजने और सभ्यता को नष्ट करने सरीखे बयान नहीं दे रहे हैं। अब टं्रप तबाही, बर्बादी के बहुत कम बयान देने लगे हैं। अब राष्ट्रपति टं्रप और ईरान युद्ध का फोकस होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग पर आ गया है। अमरीकी नाकेबंदी अभी जारी रहेगी, लेकिन ईरानी सैनिक कंटेनर जहाजों पर हमले कर रहे हैं। ईरान ने तीन जहाजों पर हमले भी किए हैं और दो जहाजों को जब्त कर लिया है। एक जहाज भारत के मुंद्रा, गुजरात बंदरगाह पर आना था। अमरीका की भारी-भरकम नौसेना ईरान का कुछ भी बिगाड़ नहीं पाई अथवा अब नरमी बरती जा रही है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम और करीब 440 किग्रा परिष्कृत यूरेनियम का मुद्दा काफी पीछे छूट गया है। भारतीय रक्षा विशेषज्ञों के दावे हैं कि अमरीका, अंतत:, ईरान को परमाणु कार्यक्रम जारी रखने की 20 साल की मोहलत देगा। उसके बाद ईरान को उसे समेट कर अमरीका को सौंपना होगा।

किसने देखे 20 साल! न तो हम होंगे और टं्रप भी निश्चित रूप से ऐसी हैसियत में नहीं होंगे। मुद्दे को टालने का फैसला किया जा सकता है। ईरान की मिसाइल रेंज कम करना अथवा उन्हें ‘बैलिस्टिक’ एक हद तक ही रखना भी अब फोकस में नहीं है। दरअसल अब राष्ट्रपति टं्रप युद्ध से बाहर निकलना चाहते हैं। उन्हें ऐसी रपटें दी गई हैं कि थाड, पैट्रियट, सटीक, ‘एसएम’ श्रेणी की, उच्चतम स्तर की, मिसाइलें 50 फीसदी से 20 फीसदी तक युद्ध में खर्च की जा चुकी हैं। यदि ऐसे में चीन जैसे देश के साथ टकराव की नौबत आती है, तो अमरीका कुछ दिन की लड़ाई लडऩे में भी अक्षम, असहाय होगा। इन मिसाइलों के पर्याप्त उत्पादन में 3-5 साल लग सकते हैं। इसके अलावा, राष्ट्रपति टं्रप की, अमरीका में ही, स्वीकार्यता 30-32 फीसदी ही शेष है। संसद और जनता में उनके खिलाफ भारी रोष, आक्रोश है। मध्यावधि चुनाव 7 नवंबर को होने हैं, जिनके लिए उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया मई में ही शुरू होनी है। ऐसे में युद्धविराम के मद्देनजर टं्रप की मजबूरी को समझा जा सकता है, लेकिन राष्ट्रपति टं्रप के सामने यक्ष-प्रश्न है कि वह अमरीका को क्या बताएंगे-युद्ध जीता अथवा अधूरा छोड़ कर लौटना पड़ा? दोनों ही स्थितियों में उनके सामने सवाल होंगे, फजीहत होगी। बहरहाल युद्ध को समाप्त कराने और होर्मुज के अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग को खुलवाने, सुरक्षित आवाजाही, को लेकर कई प्रयास किए जा रहे हैं। भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी महत्वपूर्ण बयान दिया है कि अब भारत मध्यस्थता कर सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने दोनों देशों के नेताओं से बातचीत की है। शेष विश्व भी चाहता है कि भारत यह भूमिका निभाए। किसी भी तरह युद्ध खत्म होना चाहिए। युद्ध के कारण 50 अरब डॉलर से अधिक के तेल का नुकसान हो चुका है। फ्रांस और ब्रिटेन के प्रयास से 30 देश होर्मुज को खुलवाने पर साझा विमर्श कर रहे हैं। लेकिन ईरान अब भी खाड़ी देशों और इजरायल के जल संयंत्रों, बिजली संयंत्रों और तेल-गैस ठिकानों पर हमले करने की धमकियां दे रहा है। अमरीका के करीब 1.5 लाख सैनिक और विशालकाय युद्धपोत भी ईरान को घेरे हुए मौजूद हैं। ऐसी स्थितियों में भी युद्ध समाप्त हो सकता है? प्राय: देखा गया है कि युद्ध से दोनों पक्षों को हानि ही होती है, इसलिए युद्ध में उलझना समझदारी का काम नहीं माना जाता है। यह युद्ध भी जल्द से जल्द समाप्त होना चाहिए।

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