नई दिल्ली। संयुक्त अरब अमीरात ने करीब 60 साल बाद ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) से बाहर होने का फैसला किया है। यह कदम सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक भी माना जा रहा है, जिससे सऊदी अरब और उसके करीबी सहयोगी पाकिस्तान पर असर पड़ सकता है।

यूएई और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ था, खासकर तेल उत्पादन को लेकर। यूएई ज्यादा उत्पादन करना चाहता था, जबकि सऊदी अरब कम उत्पादन के पक्ष में था। इसके अलावा, यूएई पाकिस्तान से भी नाराज था, क्योंकि वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था और ईरान के हमलों पर कड़ा रुख नहीं अपना रहा था।

ओपेक छोड़ने से यूएई को क्या फायदा?

यूएई 1967 में ओपेक में शामिल हुआ था और यह संगठन का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक है। लेकिन उत्पादन कोटा सऊदी अरब के नियंत्रण में होने से यूएई अपनी पूरी क्षमता से तेल निर्यात नहीं कर पा रहा था।

ओपेक से बाहर होने के बाद अब यूएई अपनी जरूरत के हिसाब से उत्पादन बढ़ा सकेगा और ज्यादा मुनाफा कमा सकेगा। इस फैसले से सऊदी अरब की वैश्विक तेल बाजार में पकड़ भी कमजोर हो सकती है।

खाड़ी देशों के साथ बढ़ा मतभेद

यूएई ने यह फैसला ऐसे समय लिया, जब खाड़ी देशों की बैठक चल रही थी। ईरान के हमलों के बाद भी इन देशों के बीच कोई संयुक्त कार्रवाई नहीं हो सकी। रिपोर्ट्स के अनुसार, यूएई चाहता था कि सऊदी अरब और कतर मिलकर ईरान के खिलाफ कदम उठाएं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजनीतिक समर्थन न मिलने के कारण यूएई ने आर्थिक रूप से अलग रास्ता चुनने का फैसला किया।

यूएई की सरकारी कंपनी के मुताबिक, उसका तेल उत्पादन 2027 तक 3.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 5 मिलियन बैरल हो सकता है। ईरान के कारण पहले ही तेल उत्पादन में गिरावट आई है, जिससे ओपेक की सप्लाई भी प्रभावित हुई है। यूएई का यह कदम वैश्विक तेल बाजार के संतुलन को बदल सकता है।

पाकिस्तान फैक्टर भी अहम

यूएई पहले ही पाकिस्तान पर दबाव बना चुका है। हाल ही में उसने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर वापस ले लिए, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियां भी यूएई को पसंद नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ओपेक छोड़कर यूएई सऊदी-पाक गठजोड़ को भी कमजोर करना चाहता है।

भारत को हो सकता है फायदा

यूएई के इस फैसले से वैश्विक बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ सकती है, जिससे कीमतों में कमी आ सकती है। इसका सीधा फायदा भारत जैसे आयात करने वाले देशों को मिलेगा, क्योंकि उनका तेल खर्च कम होगा और महंगाई पर भी असर पड़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है।

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