डेस्क: खून की एक रूटीन रिपोर्ट नाॅर्मल आए तो हमें बड़ी राहत मिलती है।  पर कुछ लोग इस बात से अनजान होते हैं कि अंदर कोई बीमारी चुपचाप सालों से पनप रही है। यह शायद अपनी मौजूदगी का ऐलान नहीं करती लेकिन अंदर- अंदर शरीर में हलचल मचा देती है। डॉक्टर कहते हैं कि आम टेस्ट अक्सर बीमारी के शुरुआती लक्षणों को पकड़ नहीं पाते, क्योंकि लक्षण बहुत हल्के होते हैं, टेस्ट की संवेदनशीलता सीमित होती है, और कुछ बीमारियों के लक्षण रुक-रुककर सामने आते हैं।

टेस्ट में साफ नहीं दिखती  गड़बड़ियां 

इसका मतलब यह है कि टेस्ट का “नॉर्मल” नतीजा हमेशा यह साबित नहीं करता कि सब कुछ सचमुच नॉर्मल है। इसका मतलब अक्सर यह होता है कि बीमारी अभी उस हद तक नहीं पहुंची है, जहां तक आम टेस्ट उसे पकड़ सकें। टाइम ऑफ इंडिया में छपे  हालिया आर्टिकल में  के अनुसार CBC, फ़ास्टिंग ग्लूकोज, लिपिड प्रोफाइल और लिवर फंक्शन टेस्ट जैसे बेसिक पैनल जरूरी हैं। ये साफ-साफ दिखने वाली गड़बड़ियों को पकड़ते हैं और इलाज में मदद करते हैं। लेकिन इन्हें पूरी तरह से बन चुकी बीमारी का पता लगाने के लिए बनाया गया है, ना कि बीमारी की शुरुआती बदलावों का।


 शुरुआती स्टेज में बीमारी का ये होता है संकेत 

बीमारी की शुरुआती स्टेज का बर्ताव अलग होता है। सूजन थोड़ी बढ़ सकती है, शुगर का लेवल सिर्फ़ खाने के बाद ऊपर-नीचे हो सकता है, और कोलेस्ट्रॉल के कणों की क्वालिटी बदल सकती है, न कि उनकी मात्रा। स्टैंडर्ड टेस्ट अक्सर इन बारीक बातों को पकड़ नहीं पाते। इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि डायबिटीज और दिल की बीमारी जैसी गैर-संक्रामक बीमारियां, जिनका पता बाद में चलता है, सालों तक चुपचाप शरीर में पनपती रहती हैं।  डॉक्टर कहते हैं- “कई बीमारियां शुरुआत में हल्के या बिना लक्षणों के ही सामने आती हैं, और कुछ स्थितियां उतार-चढ़ाव वाली होती हैं, जिससे उनका पता लगाना मुश्किल हो जाता है।” 

ये टेस्ट हैं जरूरी 

जैसे सुबह के समय रक्त शर्करा सामान्य लग सकती है, लेकिन भोजन के बाद अचानक बढ़ जाती है। या प्रारंभिक हृदय रोग पर विचार करें, जहां धमनियों में रुकावट दिखने से बहुत पहले ही सूजन बढ़ जाती है। चिकित्सा विज्ञान में अब बीमारियों का देर से पता लगाने के बजाय जोखिम का जल्दी पता लगाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। हृदय स्वास्थ्य के लिए, hs-CRP निम्न-स्तरीय सूजन को मापता है। लिपोप्रोटीन(a), या Lp(a), वंशानुगत हृदय रोग के जोखिम को दर्शाता है जिसे मानक कोलेस्ट्रॉल परीक्षण नहीं दिखा पाते। उन्नत लिपिड प्रोफाइल कणों के आकार और घनत्व का गहन विश्लेषण करते हैं। मधुमेह के लिए, HbA1c तीन महीनों में औसत शर्करा स्तर दिखाता है, जबकि OGTT (ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट) यह बताता है कि भोजन के बाद शरीर शर्करा को कैसे ग्रहण करता है। निरंतर ग्लूकोज निगरानी दैनिक पैटर्न को उजागर करके एक और परत जोड़ती है। 


टेस्ट करवाने से पहले इन बातों का रखें ख्याल

कैंसर का पता लगाने की तकनीक भी विकसित हुई है।  कभी-कभी, बीमारी के शुरुआती लक्षण खून में बिल्कुल भी नहीं दिखते। कम खुराक वाले सीटी स्कैन से उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों में फेफड़ों के कैंसर का जल्दी पता लगाया जा सकता है। डॉक्टर कहते हैं-जिस युवा के परिवार में दिल की बीमारी का इतिहास रहा हो, उसे शायद कम उम्र में ही एडवांस्ड लिपिड जांच की ज़रूरत पड़ सकती है। वहीं, जिस किसी को बिना किसी वजह के थकान महसूस होती हो, उसे शायद ज़्यादा गहरी मेटाबॉलिक या इन्फ्लेमेटरी मार्कर जांच की ज़रूरत हो सकती है। हेल्थकेयर का भविष्य ज़्यादा जांचें करवाना नहीं है, बल्कि ज़्यादा समझदारी से जांचें करवाना है।

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