भाजपा उस राजनीतिक विमर्श को भी ध्वस्त कर रही है कि उसे चुनौती देने का जो काम देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस नहीं कर पा रही, वह क्षेत्रीय दल बखूबी कर रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अकेले दम बहुमत और कांग्रेस के 44 सीटों पर सिमट जाने से वह विमर्श शुरू हुआ। 2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों ने भी उसे बल प्रदान किया लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से वह कमजोर पडऩे लगा है। बेशक 2024 में भाजपा को मात्र 240 सीटों पर रोक देने में क्षेत्रीय दलों की बड़ी भूमिका रही। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, तमिलनाडु में द्रमुक और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने उसमें अहम भूमिका निभाई। बेशक कांग्रेस की सीटें भी 52 से बढ़ कर 99 हो गईं लेकिन खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वह क्षेत्रीय दलों के सहारे ‘परजीवी’ है। बात गलत भी नहीं थी, इन राज्यों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों से गठबंधन के सहारे ही चुनाव लडऩे को मजबूर है।

बेशक हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में कांग्रेस की सरकारें हैं, पर पहले दोनों राज्य लोकसभा सीटों की संख्या के लिहाज से ज्यादा प्रभावी नहीं हैं। शायद इसीलिए 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से भाजपा के निशाने पर क्षेत्रीय दल और उनकी सरकारें ज्यादा नजर आती हैं। कांग्रेस के अघोषित नेतृत्व वाला विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन स्वाभाविक ही भाजपा के 240 सीटों पर सिमट जाने को अपनी सफलता मान रहा था लेकिन उसके बाद से उसके हिस्से हार के झटके ही ज्यादा आए हैं। सिर्फ झारखंड और जम्मू-कश्मीर ही अपवाद रहे, जहां कांग्रेस की उपस्थिति का सत्ता राजनीति में ज्यादा अर्थ नहीं है। जम्मू-कश्मीर में नैशनल कान्फ्रैंस का ही दबदबा है तो झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा का और विधानसभा चुनाव के बाद दोनों की ही कांग्रेस से दूरियां बढ़ती दिख रही हैं। 

48 लोकसभा सीटों वाले महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन 30 सीटें जीत गया। कांग्रेस ने सबसे ज्यादा 13 सीटें जीतीं तो उद्धव की शिवसेना ने 9, जबकि शरद पवार की राकांपा ने 8। तमिलनाडु में भी इंडिया गठबंधन 39 में 35 सीटें जीतने में सफल रहा। पश्चिम बंगाल में भी तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा को 12 सीटों पर समेटते हुए 42 में से 29 लोकसभा सीटें जीत लीं। अलग लड़ी कांग्रेस भी एक सीट जीत गई। 20 सीटों वाले केरलम् में भी कांग्रेस नीत यू.डी.एफ. 18 सीटें जीत गया, जबकि तत्कालीन सत्तारूढ़ एल.डी.एफ. के हिस्से 1 ही सीट आई। भाजपा भी पहली बार अपना खाता खोलने में सफल रही। बेशक यू.डी.एफ. की 18 में से 14 सीटें कांग्रेस की रहीं लेकिन केरलम् में गठबंधन राजनीति एक अनिवार्यता रही है। इसलिए कांग्रेस की सीटें बढ़ कर 99 हो जाने के बावजूद भाजपा के तेज रफ्तार विस्तार पर नियंत्रण में क्षेत्रीय दलों की अहम् भूमिका है। बेशक चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी, नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड, जयंत चौधरी का राष्ट्रीय लोकदल, एकनाथ शिंदे की शिवसेना, स्वर्गीय अजित पवार की राकांपा के अलावा तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक, भाजपानीत राजग में शामिल हैं लेकिन नवीन पटनायक का बीजू जनता दल, हेमंत सोरेन का झामुमो, लालू-तेजस्वी का राजद, अखिलेश यादव की सपा, एम.के. स्टालिन का द्रमुक, उमर अब्दुल्ला की नैशनल कान्फ्रैंस, अरविंद केजरीवाल की ‘आप’ और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस समेत तमाम बड़े क्षेत्रीय दल उससे दूरी बनाए हुए हैं।

संयोग कहें या प्रयोग, 2024 से ही इन दलों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। पटनायक के बीजद की दशकों पुरानी सत्ता ओडिशा में तो भाजपा ने लोकसभा चुनाव के साथ हुए विधानसभा चुनाव में ही उखाड़ फैंकी थी, महाराष्ट्र में चंद महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में पासा पलट दिया, जब विपक्ष हाशिए पर चला गया। भारतीय राजनीति में धूमकेतु की तरह चमके केजरीवाल की ‘आप’ से भी भाजपा ने पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में सत्ता छीन ली। पिछले साल के अंत में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में ही ऐसे ही एकतरफा परिणाम आए, जिनके लिए विपक्ष सीधे-सीधे चुनाव आयोग की भूमिका पर सवालिया निशान लगा रहा है। अरसे से ई.वी.एम. पर संदेह जताता रहा विपक्ष अब एस.आई.आर. प्रक्रिया में बड़ी संख्या में नाम काटे जाने को भाजपा की अप्रत्यक्ष चुनावी मदद करार दे रहा है।  बेशक चुनाव आयोग की भूमिका से जुड़े विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक गए हैं लेकिन चुनाव परिणाम नहीं बदल रहे। 

पश्चिम बंगाल को ममता बनर्जी का सत्ता दुर्ग अभेद्य माना जा रहा था। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 200 पार का नारा दे कर 77 सीटों पर थम गई थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा को और बड़ा झटका दिया था। उसके चलते माना जा रहा था कि इस बार भाजपा 100 पार भले चली जाए, पर ममता की सत्ता नहीं डिगेगी लेकिन 2021 के चुनाव परिणाम 2026 में लगभग पलट गए। 

बेशक तमिलनाडु की परंपरागत द्रविड़ राजनीति के विरुद्ध त्रिशंकु विधानसभा में चमत्कारिक रूप से सबसे बड़े दल के रूप में उभरी अभिनेता जोसेफ विजय चंद्रशेखर की टी.वी.के. भी एक क्षेत्रीय दल ही है लेकिन दशकों पुराने स्थापित क्षेत्रीय दलों-द्रमुक और अन्नाद्रमुक तो सत्ता के खेल से बाहर नजर आ रहे हैं। अब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और पंजाब में ‘आप’ ही 2 ऐसे क्षेत्रीय दल हैं, जिन्हें चुनावी पटखनी देना भाजपा के लिए शेष है। इन दोनों राज्यों में अगले साल ही विधानसभा चुनाव होंगे। पंजाब में अगर शिरोमणि अकाली और भाजपा फिर से दोस्त बन गए तो पंजाब की चुनावी तस्वीर बदलते भी देर नहीं लगेगी। हां, यह बात अलग है कि एक और क्षेत्रीय दल के रूप में शिरोमणि अकाली दल की सत्ता राजनीति में वापसी हो जाएगी लेकिन वह भाजपा का दोस्त ही होगा-जैसे कि आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडु, पुड्डुचेरी में एन. रंगासामी आदि हैं।-राज कुमार सिंह

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