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मई की इस तपती दोपहर में देश का भविष्य, हमारा युवा, सड़कों पर खड़ा है। दिल्ली का जंतर-मंतर हो या पटना की गलियां, हर तरफ एक ही आवाज गूंज रही है, ‘न्याय दो!’ यह केवल सिस्टम से हताश छात्रों का प्रदर्शन मात्र नहीं, यह उस भरोसे का टूटना है, जो एक साधारण भारतीय परिवार अपने बच्चे की मेहनत, ईमानदारी और सपनों पर करता है। 2024 का घाव अभी भरा भी नहीं था। ग्रेस माक्र्स, पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। जनमानस और छात्रों के आक्रोश के बीच सरकार ने सुधारों का भरोसा दिया, समितियां बनीं, नई सुरक्षा तकनीकों की घोषणाएं भी हुईं लेकिन 2026 में फिर वही खबरें सामने हैं, छापेमारी, सॉल्वर गैंग, गिरफ्तारियां और लीक हुए प्रश्नपत्र। तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर गलती कहां है? सिस्टम में, नीयत में, या उन लोगों में, जिन्होंने शिक्षा को कारोबार बना दिया है?

आज सी.बी.आई. राजस्थान के सीकर से लेकर महाराष्ट्र के नासिक तक छापेमारी कर रही है। लेकिन असली प्रश्न यह नहीं कि दोषी कौन है, असली प्रश्न यह है कि हमारा सिस्टम इतना खोखला कैसे हो गया कि 25 लाख छात्रों का भविष्य कुछ माफियाओं की तिजोरियों का गुलाम बन गया। हम किस ‘डिजिटल इंडिया’ की बात करते हैं, जब देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से एक को भी पारदर्शी और सुरक्षित तरीके से आयोजित नहीं कर पा रहे? तथाकथित तौर पर अचूक रूप से सुरक्षित प्रणाली बनाने की घोषणा की जाती है, करोड़ों रुपए निगरानी, बायोमैट्रिक्स, जैमर्स और जी.पी.एस. ट्रैकिंग पर खर्च किए जाते हैं लेकिन प्रश्नपत्र फिर भी लीक हो जाता है! इसका अर्थ साफ है कि समस्या बाहर नहीं, भीतर है। दीमक दीवारों पर नहीं, नींव में बैठ चुकी है। समस्या का सबसे भयावह पक्ष यह है कि यह अब कोई स्थानीय गिरोह नहीं रह गया। बिहार से हरियाणा, राजस्थान से महाराष्ट्र तक फैले सॉल्वर नैटवर्क अब शिक्षा व्यवस्था के समानांतर एक ‘अंडरग्राऊंड इंडस्ट्री’ बन चुके हैं। परीक्षा शुरू होने से कुछ घंटे पहले टैलीग्राम और व्हाट्सऐप पर प्रश्नपत्र तैरने लगते हैं। यह तकनीकी गलती नहीं, बल्कि सुनियोजित संगठित अपराध है।

दुनिया के विकसित देशों में मैडिकल और उच्च स्तरीय परीक्षाएं पूर्णत: डिजिटल और एन्क्रिप्टेड मॉडल पर आधारित हैं। चीन की गाओकाओ (Gaokao) और अमरीका की Gaokao जैसी परीक्षाओं में पेपर लीक की कल्पना भी राष्ट्रीय संकट मानी जाती है। भारत आज भी करोड़ों प्रश्नपत्र छापकर ट्रकों के माध्यम से परीक्षा केंद्रों तक भेजने की पुरानी व्यवस्था पर निर्भर है। जब प्रश्नपत्र भौतिक रूप से यात्रा करेंगे, तब लीक की खिड़कियां खुली ही रहेंगी। इस संकट का दूसरा पक्ष शिक्षा का खतरनाक बाजारीकरण है। कई कोचिंग संस्थान अब शिक्षा के मंदिर नहीं, बल्कि ‘रैंक फैक्ट्री’ में बदल चुके हैं। गारंटीशुदा चयन के विज्ञापन, टॉपर पैकेजेस और रिजल्ट मार्कीटिंग की अंधी दौड़ ने शिक्षा के नैतिक आधार को कमजोर कर दिया है। जब सफलता केवल रैंक से मापी जाएगी, तब ईमानदारी धीरे-धीरे हाशिए पर चली जाएगी। अब केवल ‘कड़ी निंदा’ और ‘जांच के आदेश’ से काम नहीं चलेगा। यदि सचमुच बदलाव चाहिए, तो परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह  सी.बी.टी. (कम्प्यूटर बेस्ड टैस्ट) आधारित बनाना होगा। प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने से कुछ मिनट पहले एन्क्रिप्टेड डिजिटल सर्वर के माध्यम से उपलब्ध कराए जाएं।
पेपर लीक में शामिल लोगों की संपत्ति जब्त हो, फास्ट ट्रैक अदालतों में सुनवाई हो और सजा ऐसी हो कि अगली पीढिय़ां भी याद रखें।

सरकार को यह समझना होगा कि छात्र कोई वोट बैंक नहीं हैं। वे इस देश की रीढ़ हैं। यदि यही रीढ़ टूट गई, तो विकसित भारत का सपना केवल भाषणों तक सीमित रह जाएगा। एन.टी.ए. के अधिकारियों को कभी उस छात्र की आंखों में झांकना चाहिए, जिसने गांव की बिजली कटौती के बीच लालटेन जलाकर पढ़ाई की, जिसके परिवार ने कर्ज लेकर उसे कोङ्क्षचग कराई और अंत में उसके हाथ क्या आया? एक लीक हुआ पेपर! एक रद्द परीक्षा! और टूटता हुआ विश्वास! साहब, अब समय मरहम का नहीं, सर्जरी का है क्योंकि जब युवाओं का भरोसा टूटता है, तब केवल एक परीक्षा नहीं हारती, पूरा राष्ट्र हारने लगता है।-डा. नीलम महेंद्र

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