सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की SIR कवायद को संवैधानिक और कानूनी रूप से पूरी तरह वैध ठहराया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसमें किसी भी प्रकार का मनमाना काम नहीं किया गया है. दो जजों की बेंच (जिसकी अगुवाई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची कर रहे थे) ने फैसला सुनाया कि संविधान के तहत निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र चुनाव (Free and Fair Election) कराना चुनाव आयोग की प्राथमिक जिम्मेदारी है. इसके लिए आयोग इस तरह के कदम उठाने के लिए पूरी तरह सक्षम और अधिकार संपन्न है.

राजनीतिक दलों द्वारा आरोप लगाया जा रहा था कि इस प्रक्रिया के जरिए नागरिकता (Citizenship) तय करने की कोशिश की जा रही है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए माना कि इसका नागरिकता तय करने से कोई संबंध नहीं है; इसका एकमात्र उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची सही रहे और वास्तविक मतदाता ही अपने मत का प्रयोग कर सकें.

देश की सबसे बड़ी अदालत का अंतिम फैसला होने के कारण अब इसके खिलाफ आगे अपील करने का मार्ग बंद हो चुका है. हालांकि, पुनर्विचार याचिका (Review Petition) या क्यूरेटिव पिटीशन (Curative Petition) जैसे बेहद सीमित कानूनी विकल्प ही शेष बचे हैं. चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगे पक्षपात तथा प्रक्रिया को लेकर उठाए गए तमाम राजनीतिक आरोपों को कोर्ट ने पूरी तरह निराधार साबित कर दिया है. इससे प्रक्रिया पर चल रहा राजनीतिक बवाल अब समाप्त होने की उम्मीद है.

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