पिछले कुछ समय के दौरान ए.आई. अर्थात कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने दुनिया में बड़ी तेजी से पांव पसारे हैं तथा बड़ी संख्या में बच्चे और बड़े सभी इस पर निर्भर होते जा रहे हैं। छोटे से छोटा काम करना हो या पत्र और निबन्ध लिखना हो, ए.आई. द्वारा चैट जी.पी.टी. आदि से कुछ ही मिनटों में आसानी से कर लिया जाता है। लोगों ने इसे किसी भी काम को निपटाने का आसान रास्ता मान कर बड़ी तेजी से इसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। परंतु बात सिर्फ कुछ मिनटों की नहीं है, मूल बात यह है कि इसके लिए आप अपनी कितनी प्रतिभा का इस्तेमाल कर रहे हैं या क्या आप ए.आई. के गुलाम बन कर रहना चाहेंगे! ए.आई. के लाभ चाहे कितने भी क्यों न हों, इसकी कुछ हानियां भी हैं।

इसी विषय पर बेंगलुरू में हाल ही में आयोजित गोष्ठïी में विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। विशेषज्ञों ने ए.आई. की लोगों के मानसिक स्वास्ïïथ्य को प्रभावित करने की क्षमता को लेकर सचेत किया कि कोई व्यक्ति जब अपने तौर पर कुछ लिखना या करना चाहता है तो उसे उस विषय पर पढऩा और सोचना पड़ता है, परंतु ए.आई. की सहायता लेने पर व्यक्ति को कुछ भी सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ती। 

यदि कोई व्यक्ति स्वयं को अकेला महसूस करता है तो चैट बाक्स पर बात करना शुरू कर देता है परंतु ऐसा करने से व्यक्ति और भी अकेला हो जाता है, धीरे-धीरे दूसरों से बात करने का हुनर भूल जाता है। लोग अब अपने-अपने कमरों में ही बैठ कर कम्प्यूटरों पर लगे रहते हैं। दीर्घकाल तक ऐसा करने वालों और अपने अकेलेपन में सिमट कर रह जाने वालों को ए.आई. मानसिक तौर पर प्रभावित करता है। हर व्यक्ति के पास दूसरों को सिखाने के लिए कुछ न कुछ होता है लेकिन ए.आई. में संवेदना या भावनात्मकता नहीं हो सकती। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है ए.आई. के जरिए आने वाले डाटा आदि पर किसी का नियंत्रण नहीं है और न ही ए.आई. के जरिए आने वाली सामग्री के लिए कोई नियम आदि निर्धारित हैं, अत: ए.आई. की सहायता लेने वाले को गलत डाटा भी दिया जा सकता है। 

यही नहींं, ए.आई. द्वारा किसी व्यक्ति की प्राईवेसी में से सब जानकारियां निकाल कर बाद में उसका दुरुपयोग करके उसे ब्लैकमेल भी किया जा सकता है। अत: इस सम्बन्ध में कठोर नियम बन जाने तक ए.आई.को अपना मित्र नहीं बना सकते। यह अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि इस पर नजर रखें कि उनके बच्चे कितनी देर तक मोबाइल फोन या कम्प्यूटर पर बैठकर वहां क्या कर और पढ़ रहे हैं। यह सरकारों की जिम्मेदारी है कि ए.आई. के जरिए केवल सच्चाई ही बताने के नियम बनाएं न कि ऑनलाइन कुछ भी डाल दिया जाए। जब तक ऐसे नियम नहीं बनेंगे जो कि इस समय कम देशों की सरकारें और न ही अभिभावक बना रहे हैं तब तक ए.आई. द्वारा प्रदत्त जानकारियों की सत्यता पर प्रश्नचिन्ह लगा ही रहेगा!  समाचारपत्रों द्वारा गलत समाचार छापने पर उन पर केस चलता है लेकिन ‘ऑनलाइन’ व्यक्ति कुछ भी कर सकता है और उस पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। थोड़ा-बहुत बस इतना है कि कुछ वैबसाइटों पर सम्बन्धित व्यक्ति का डाटा रिमूव करने की व्यवस्था है परंतु किस आधार पर उसे रिमूव किया जा रहा है और ऐसा कौन कर रहा है, यह फैसला करने का कोई पैमाना नहीं है। 

ए.आई. का भावात्मक रूप से व्यक्ति की बुद्धिमत्ता आदि सब चीजों पर कुप्रभाव पड़ रहा है। मानव का विकास विचार प्रक्रिया पर निर्भर करता है। इसमें सोचना, नई चीज निकालना, दूसरों के साथ जुडऩा और भावात्मक तथा मानसिक रूप से दोनों के विकास के कारण हम यहां तक पहुंचे हैं और यह काम यदि बाहर की किसी ऐसी हस्ती को दे देंगे, जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है और जिसका कोई आधार ही नहीं है तथा जो हमारे हाथ में भी नहीं है, तो हमारी प्रगति किस ओर जाएगी, यह कौन बता सकता है? इस दुनिया में हमारे अस्तित्व का कारण हमारी वैज्ञानिक सोच, आविष्कारक प्रवृत्ति तथा कलात्मकता है, अगर हम इन्हीं को त्याग देंगे तो हमारा क्या होगा? इन सब बातों का सार यही है कि ए.आई. का इस्तेमाल करना युवाओं के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। हालांकि कहा जाता है कि ए.आई.की मैडिकल साइंस में बहुत उपयोगिता है तथा रोबोट आप्रेशन तक कर सकते हैं। 

अभी हाल ही में ए.आई. पर आयोजित एक सम्मेलन में एक लोक गायक ने एक गीत गाया तो वहां मौजूद रोबोट ने कहा कि वह भी गा सकता है और तुरंत वह गाना गा दिया। इस पर वहां मौजूद लोगों ने कहा कि उसके गाने में असली जैसी गहराई नहीं है, तो रोबोट ने कहा कि मैं अगली बार गाऊंगा तो मेरा गीत भी असली वाले लैवल पर आ जाएगा। जब एक फिल्म की कहानी बता कर उससे पूछा कि क्या तुम इसकी आगे की कहानी (सीक्वल) लिख सकते हो, तो उसने पांच मिनट में ही स्टोरी का प्रिंट निकाल कर दे दिया। अमरीका में 21 प्रतिशत डाक्टर भारतीय हैं, परंतु वहां एक नर्स ने ए.आई. से लोगों को डायग्नोस करने की बात कही है, जिसे ऐसा करने के लिए ट्रम्प प्रशासन बहुत प्रोत्साहित कर रहा है परंतु इसमें दिक्कत यह है कि कोई रोग गलत डायग्नोस होने या रोगी की मौत जैसी गड़बड़ के लिए कौन जिम्मेदार होगा-अस्पताल, डाक्टर या ए.आई.? कुल मिला कर निष्कर्ष यही निकलता है कि किसी भी चीज को जब अनियंत्रित छोड़ दिया जाता है तो उससे गलतियां बढऩे की आशंका होती है, अत: ए.आई. पर मानवीय नियंत्रण आवश्यक है न कि ए.आई. का मानव पर।

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