आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दौड़ में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है. देश के कई शहरों में बड़े-बड़े डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है और टेक कंपनियां अरबों रुपये का निवेश कर रही हैं. इसी बीच आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में प्रस्तावित एक बड़े एआई डेटा सेंटर को लेकर नई बहस शुरू हो गई है. सवाल यह है कि डिजिटल भविष्य को मजबूत बनाने वाले ये डेटा सेंटर आखिर कितने प्राकृतिक संसाधनों की खपत करते हैं? विशेषज्ञों का कहना है कि एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के साथ पानी की मांग भी तेजी से बढ़ रही है, जो आने वाले समय में बड़ी चुनौती बन सकती है.
डेटा सेंटरों को आखिर इतनी ज्यादा पानी की जरूरत क्यों पड़ती है?
एआई मॉडल, क्लाउड सर्विस और बड़े लैंग्वेज मॉडल्स को चलाने वाले डेटा सेंटरों में हजारों हाई-परफॉर्मेंस सर्वर लगातार काम करते हैं. इन सर्वरों से भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती है. अगर इन्हें समय पर ठंडा न किया जाए तो मशीनें प्रभावित हो सकती हैं. यही वजह है कि डेटा सेंटरों में बड़े कूलिंग सिस्टम लगाए जाते हैं, जिनमें बड़ी मात्रा में पानी का इस्तेमाल होता है. जैसे-जैसे एआई का उपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इन सेंटरों की कूलिंग जरूरत भी बढ़ती जा रही है.
एक दिन में हजारों लोगों जितना पानी खर्च कर सकते हैं डेटा सेंटर
विभिन्न रिसर्च रिपोर्ट्स के अनुसार बड़े डेटा सेंटर प्रतिदिन लाखों गैलन पानी की खपत कर सकते हैं. कुछ मामलों में यह खपत इतनी अधिक होती है कि उसकी तुलना 10 हजार से 50 हजार लोगों की दैनिक पानी जरूरत से की जाती है. यही वजह है कि पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में नए डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठने लगे हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भविष्य में एआई इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बढ़ता है तो जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
विशाखापत्तनम परियोजना को लेकर क्यों बढ़ रही हैं चिंताएं?
विशाखापत्तनम को देश के उभरते टेक्नोलॉजी हब के रूप में देखा जा रहा है. यहां बड़े एआई डेटा सेंटर निवेश की तैयारी चल रही है. हालांकि स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि शहर पहले से ही जल संसाधनों की चुनौतियों का सामना कर रहा है. ऐसे में बड़े पैमाने पर पानी और बिजली की जरूरत रखने वाले डेटा सेंटर भविष्य में संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकते हैं. कुछ इलाकों में भूमि उपयोग और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं.
क्या नई तकनीकें इस समस्या का समाधान बन सकती हैं?
डेटा सेंटर उद्योग अब पानी की खपत कम करने वाली नई तकनीकों पर भी काम कर रहा है. इमर्शन कूलिंग और डायरेक्ट-टू-चिप कूलिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को भविष्य का समाधान माना जा रहा है. इनकी मदद से सर्वरों को अधिक प्रभावी तरीके से ठंडा किया जा सकता है और पानी की जरूरत को कम किया जा सकता है. कई वैश्विक टेक कंपनियां ऐसे समाधानों में निवेश बढ़ा रही हैं ताकि एआई इंफ्रास्ट्रक्चर का पर्यावरणीय प्रभाव कम किया जा सके.
एआई के भविष्य के साथ जुड़ा है संसाधनों का संतुलन
भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था और एआई टेक्नोलॉजी में वैश्विक भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी विकास के साथ पानी, बिजली और पर्यावरणीय संसाधनों के संतुलित उपयोग पर भी उतना ही ध्यान देना होगा. आने वाले वर्षों में डेटा सेंटरों का विस्तार केवल तकनीकी नहीं बल्कि पर्यावरणीय और सामाजिक चर्चा का भी बड़ा विषय बन सकता है.



















