अब यह भारतीय लोकतंत्र और राजनीति का नया मुहावरा होना चाहिए। हम सुनते आए थे कि जनता ‘जनार्दन’ होती है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी सार्वजनिक मंचों से यह कई बार स्वीकार किया है और चुनाव के बाद जनता के सामने नतमस्तक भी हुए हैं। दरअसल लोकतंत्र के शास्त्रीय अर्थ तो यही हैं, क्योंकि जनता ही जन-प्रतिनिधि चुनती है। प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, कद्दावर नेताओं को खारिज कर सत्ता से बाहर भी करती रही है, लेकिन अब भाजपा नए किस्म की राजनीति गढ़ रही है। फिलहाल पश्चिम बंगाल का ही उदाहरण लें। भाजपा ने चुनाव में 15 साल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को करारी पराजय दी है। यह जनादेश स्पष्ट है, लेकिन भाजपा इसी से संतुष्ट नहीं है। तृणमूल के भीतर बगावत, टूट और पाला-बदल कोई वैचारिक और नैतिक नहीं है। दरअसल भाजपा तृणमूल को तोड़ कर, अंतत:, ममता बनर्जी को ‘पार्टीहीन’ करने पर आमादा है। दिलचस्प यह है कि बंगाल में तृणमूल का बागी गुट प्रमुख विपक्षी दल है, लिहाजा उसके नेता ऋतब्रत बनर्जी को स्पीकर ने ‘नेता प्रतिपक्ष’ की मान्यता दी है। दिल्ली में तृणमूल के 20 लोकसभा सांसदों ने ‘अलग गुट’ के तौर पर, बैठने की अलग व्यवस्था करने के लिए, स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखा है। संभवत: स्पीकर सोमवार, 15 जून को, बागी सांसदों से मुलाकात करेंगे और उनके हस्ताक्षरों की पुष्टि करेंगे। सांसदों का बागी गुट एनडीए को समर्थन देना चाहता है। बाद में वे भाजपा में भी विलीन हो जाएं, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सहज सवाल यह है कि आखिर विपक्ष कौन है? तृणमूल विपक्षी दल है अथवा एनडीए का संभावित घटक…! बंगाल में विधायकों और सांसदों को जनादेश क्या मिले थे? बेशक जनादेश भाजपा के खिलाफ थे, लेकिन अब कमोबेश सांसद सत्ता-समर्थक हो रहे हैं। यह कौन-सी राजनीति या जनादेश की स्वीकृति है? क्या अब संवैधानिक शुचिता या नैतिकता की बात करना ही छोड़ दें? सर्वोच्च अदालत ने भी विभाजन, टूट-फूट विधायक अथवा संसदीय दल में नहीं माना था।

शायद ऐसा संविधान-पीठ का फैसला है। शीर्ष अदालत पार्टी के भीतर दोफाड़ और दलबदल को ‘विभाजन’ मानती है, लिहाजा तृणमूल के भीतर भाजपा जो करवा रही है, वह असंवैधानिक है। ममता बनर्जी को इसकी पर्याप्त जानकारी होगी, तभी उन्होंने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तय करने के स्पीकर के फैसले को कोलकाता उच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है। सवाल दलबदल का इतना गंभीर नहीं है। केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से बागी तृणमूल सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने, एक और बागी शताब्दी रॉय के साथ, मुलाकात और विमर्श किया है। सुदीप ने गृहमंत्री अमित शाह से भी करीब 30 मिनट तक मुलाकात, बातचीत की है। सुदीप कभी तृणमूल के संसदीय नेता और ममता के बेहद भरोसेमंद होते थे। रविवार को मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी एक बार फिर बागी सांसदों की बैठक में उपस्थित रहे। यदि तृणमूल के तिनका-तिनका होने या करने में भाजपा की कोई भूमिका नहीं है, तो केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री बागी चेहरों से लगातार, बार-बार, मुलाकातें क्यों कर रहे हैं? क्या बार-बार चाय पीने का मन करता है? दरअसल इस राजनीति ने नया मुहावरा यह गढ़ दिया है कि अब विपक्ष भी ‘सत्तामय’ होगा! कोई ताकतवर, प्रतिद्वंद्वी विपक्ष नहीं होगा! यदि राजनीतिक तौर पर किसी दल या जन-प्रतिनिधि को जिंदा रहना है, तो भाजपा के मुताबिक ही चलना पड़ेगा। अब चुनाव के दौरान भी जनता नहीं, सत्ता और उसके प्रबंध नहीं, ‘जनार्दन’ होंगे! क्या इसी तरह धीरे-धीरे लोकतंत्र का लोप होगा? दरअसल यह क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व खत्म करने की बड़ी राजनीतिक साजिश है। उन्हें जेल जाने के खौफ दिखाए जा रहे हैं, ईडी और सीबीआई को निरंकुश कर दिया गया है, अब पुलिस रात के अंधेरे में भी, किसी भी नेता के घर में, घुस सकती है। बहरहाल भाजपा तृणमूल के 20 सांसद तोड़ ले और द्रमुक के 22 सांसदों का समर्थन जुगाड़ ले, फिर भी लोकसभा में उसका दो-तिहाई बहुमत नहीं होगा। अभी शिवसेना (उद्धव) के भी सांसद तोडऩे की रणनीति पर विचार किया जा रहा है। ऐसे माहौल में सर्वोच्च अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए, क्योंकि संविधान ने उसे कई विशेष शक्तियां दी हैं। चुनाव आयोग तो पहले से ही ‘भाजपा का भोंपू’ बना है। यदि तृणमूल का मामला आयोग तक गया, तो नियति शिवसेना और एनसीपी वाली तय है।

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