अमरीकी कांग्रेस (संसद) ने रूस और ईरान पर प्रतिबंधों वाला नया बिल पारित कर दिया है। सीनेट (हमारी राज्यसभा के समान) ने पहले ही 86-11 मतों से पारित कर दिया था। अब अमरीकी समयानुसार, 16 सितंबर, बुधवार, को प्रतिनिधि सभा (लोकसभा के समान) ने भी 262-159 मतों से यह बिल पास कर दिया। राष्ट्रपति टं्रप के हस्ताक्षर करने की औपचारिकता के बाद यह कानून बन जाएगा। उसी के साथ राष्ट्रपति का संवैधानिक विशेषाधिकार बढ़ जाएगा कि वह किसी भी देश पर, शून्य से 100 फीसदी तक, टैरिफ थोप सकते हैं। टैरिफ कम या ज्यादा भी कर सकते हैं। दरअसल इस बिल के पारित होते ही राष्ट्रपति टं्रप ने एक बार फिर ‘टैरिफ बम’ फोड़ दिया है। हालांकि इससे पहले राष्ट्रपति टं्रप ने जब कई देशों पर मनमाना टैरिफ थोपा था, तो अमरीकी सर्वोच्च अदालत ने उसे ‘अवैध’ करार देते हुए खारिज कर दिया था। अब नया कानून बनने के बाद भी न्यायपालिका इसकी समीक्षा कर सकती है, लेकिन उसे खारिज करना आसान नहीं होगा। बिल में जिन देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का संदर्भ था, उसमें भारत, चीन, हंगरी, स्लोवाकिया, अजरबैजान, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कजाकिस्तान, तुर्किये आदि देशों के नाम उल्लेखनीय हैं। इनमें अधिकतर अमरीका-समर्थक या ‘मित्र देश’ हैं। भारत को तो अमरीका लगातार ‘रणनीतिक साझेदार’ मानता रहा है। राष्ट्रपति टं्रप प्रधानमंत्री मोदी को ‘डियर फ्रेंड’ कहते और उनकी ‘महानता’ का गुणगान करते नहीं थकते। यह सार्वजनिक है और दोनों नेता आपस में ‘गलबहियां’ डालते रहे हैं। यह कैसी दोस्ती है? दोस्ती और फिर 100 फीसदी टैरिफ का बोझ…! भारत अमरीकी बाजार में ‘अप्रासंगिक’ हो सकता है! कोई भी ग्राहक महंगी चीज क्यों खरीदेगा? भारत के रत्न, कीमती पत्थर, जवाहरात, वस्त्र और फार्मा आदि के निर्यातकों का तो दम ही निकल जाएगा! भाड़ में जाए ऐसी दोस्ती और रणनीतिक साझेदारी…!

भारत सरकार को भी टैरिफ का जवाब टैरिफ से ही देना चाहिए। यही नहीं, अपना ‘तुरुप का पत्ता’ भी खेलते हुए स्पष्ट करना चाहिए कि टं्रप के टैरिफवाद के मद्देनजर भारत अमरीका के साथ ‘व्यापार समझौता’ फिलहाल स्थगित करता है। भारत ऐसे समझौते पर अधिक, गहन विचार करना चाहता है। यह गौरतलब है कि भारत ने 40 देशों के साथ ‘मुक्त व्यापार समझौते’ किए हैं, जो किसी अन्य देश ने नहीं किए हैं। कहीं भी टैरिफ रोड़ा नहीं बना है। प्रस्तावित व्यापार समझौते का जो मसविदा सामने आया था, उसके मुताबिक अमरीका भारत के साथ 500 अरब डॉलर तक का कारोबार करना चाहता है। हमारी मुद्रा में यह करीब 48 लाख करोड़ रुपए का कारोबार होगा। क्या अमरीका को भारत में इतना गहरा घुसने दिया जाना चाहिए? दरअसल 100 फीसदी तक का टैरिफ एक धमकी है और राष्ट्रपति टं्रप उसके जरिए रूस और ईरान पर आर्थिक पाबंदियों के व्यापक दबाव बनाना चाहते हैं। उनकी रणनीति और व्यापार-नीति यह है कि भारत और चीन इन दो युद्धरत देशों से कच्चा तेल और गैस न खरीदें अथवा बहुत कम मात्रा में खरीदें। अमरीका रूस से 56,597 करोड़ रुपए का कारोबार करता है। क्या टं्रप को उस पर आपत्ति नहीं है? उस कारोबार को भी खत्म किया जाना चाहिए। पूरा यूरोप रूस से गैस का आयात करता है, अमरीका ने उसे क्यों छोड़ दिया? टं्रप चाहते हैं कि भारत और चीन जैसे बड़े देश अमरीकी तेल खरीदें, क्योंकि अब वेनेजुएला के तेल को मिला कर अमरीका विश्व में तेल का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। कमोबेश चीन ने तो साफ ऐलान कर दिया है कि वह रूस और ईरान से तेल खरीदता रहेगा। युद्ध, ऊर्जा-संकट और बाधित सप्लाई चेन के बावजूद रूस भारत को सर्वाधिक कच्चा तेल (करीब 50-55 फीसदी) मुहैया करवा रहा है, ईरान से भी सप्लाई दोबारा शुरू की गई है, लिहाजा भारत को भी साफ कहना चाहिए कि देश की ऊर्जा-जरूरतों और कीमतों के मद्देनजर वह रूस और ईरान से तेल-गैस खरीदता रहेगा। भारत अमरीका और राष्ट्रपति टं्रप से क्यों डरे? दोनों देशों के बीच 11 लाख करोड़ रुपए (करीब 132 अरब अमरीकी डॉलर) का कारोबार होता है। अब अमरीका का निर्यात बढ़ कर करीब 87,000 करोड़ रुपए हो गया है। क्या टं्रप उसे खोना चाहेंगे? बहरहाल बार-बार टैरिफ की घोषणा कर राष्ट्रपति टं्रप भारत की बांह नहीं मरोड़ सकते। वैसे यह भी सही है कि ट्रंप की आर्थिक नीतियों के कारण विश्व भर में उथल-पुथल मची हुई है। शेयर बाजार कभी ढह जाता है, और कभी सुधर जाता है। ऐसी अनिश्चय वाली स्थिति के कारण शेयर बाजार का कबाड़ा होने के चलते अनेक देश प्रभावित हुए हैं। ट्रंप खुद ही तय नहीं कर पा रहे कि उन्हें करना क्या है।

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